सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

"मुझे अब वे पराया कहने लगे"



बेरुखी इस कदर बढ़ गयी हमसे ,
मुझे अब वे पराया कहने लगे  !



बाद मुद्दत के ज़ुबां पे आयी,
जो ये शिकस्त की कहानी ,
फासले जो दरमयां करने लगे.........

बेरुखी इस कदर बढ़ गयी हमसे ,
मुझे अब वे पराया कहने लगे !




साथ निभाने की खाकर कसमे,
बात आयी जब रस्मे निबाह की
हाले मुफलिसी बयाँ करने लगे...........

बेरुखी इस कदर बढ़ गयी हमसे ,
मुझे अब वे पराया कहने लगे !



ज़िन्दगी जीना तो एक तकल्लुफ था 
तजुर्बे हवादिश का जब ज़िक्र हुआ ,
राह-ए-गुजर को जाया कहने लगे .............

बेरुखी इस कदर बढ़ गयी हमसे ,
मुझे अब वे पराया कहने लगे !

" यदि होते न लोचन "


१- श्रृंगार शून्य होती सुषमा 
संशय हीन होता 
यह जग ,
अन्तर्गगन में 
न विचरण करते 
विचार चेतन के विहग ;
कल्पना हीन होता यह मन !
यदि होते न लोचन 

२- न दीनता प्रति 
उर में उमड़ती दया,
न जन्मती करुणा
उठता न भाव कोई,
क्लांत होता न अत्न,
देख मानव की तृष्णा !
न विछिप्त होता अंतर्मन ,
यदि होते न लोचन 

३- न कोई कहता ,
प्रतीक्षा में पथराई आँखें ,
न कोई दिवा स्वप्न देखता ,
न होता कोई,
 जीवन में अपना - पराया ,
न किसी को दृष्टिहीन कहता !
भावना शून्य होते जड़-चेतन ,
यदि होते न लोचन 

४-विटप सम 
होता मानव जीवन 
अर्थ हीन होता कर्म,
उदरपूर्ति 
हेतु होते व्यसन ,
पर न होता कोई मर्म!
कहाँ होता चिन्तन - मनन ,
यदि होते न लोचन 

५-देख पर सुख,
न होती ईर्ष्या ,
न उपजता कोई विषाद,
रंग - हीन , स्वप्न- हीन 
होता जीवन ,
न होता आपस में 
कोई विवाद!
हर्ष-द्वेष रहित होता निश्छल मन ,
यदि होते न लोचन 

६- न मानव करता,
मानवता पर अत्याचार,
पुष्प-प्रस्तर का मात्र , 
होता मृदुल-अश्मर प्रहार,
दिवस निशा का बोध ,
कराता मात्र यह,
नीरस स्वर-संचार !
रस हीन होते ये धरा-गगन ,
यदि होते न लोचन 

७- किस हेतु होती अभिव्यक्ति 
होता न जीवन का आधार ,
घायल होती रहती मानवता ,
कौन किस पर करता उपकार ,
तरसती दया, करुणा रोती,
प्रकट न होता कोई आभार!
निष्प्राण तुल्य होता यह जीवन,
यदि होते न लोचन 

८- व्यर्थ होता कलियों पर 
भ्रमरों का गुंजन ,
व्यर्थ होता ऋतुराज का ,
धरा पर आगमन ,
व्यर्थ होता कानन में ,
मयूरों का नर्तन !
कौन सुनता उरों का स्पंदन 
यदि होते न लोचन 

९-श्रृंगार -सुषमा हीन,
पुष्प पल्लवी होती,
यह प्रकृति सुन्दरी 
विधवा सी रोती,
हेतु अस्तित्त्व यह,
मौन धरा सोती!
अर्थ हीन होता सृजेता का सृजन ,
यदि होते न लोचन !

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

राज़ न पूंछो..

हँस रहा हूँ मै आप की महफिल में,
आज मेरे हँसने का राज़ न पूंछो......!

जिन्दगी की ग़जल गुनगुनाने चला ,
निकली जो हलक से आवाज़ न पूंछो ....!

कोशिश थी एक हशीं मुशायरे की,
गमे शायरी का ये अंदाज़ न पूंछो.......!

बजता ही रहा जिन्दगी की धुन पर ,
रौनके महफिल का साज़ न पूंछो....!

आ गयी जो ये बात जुबाँ पर आज ,
मकशद -ए- बयाँ आज न पूंछो........!

हँस रहा हूँ मै आप की महफिल में,
आज मेरे हँसने का राज़ न पूंछो......!

रविवार, 16 अक्तूबर 2011

आह्लाद !


व्यथा विकृत करती अंतस को ,
मनः स्थिति हो उठती विचलित /
जीवन संयम में जो था निरत ,
कर्म  पथ पर हो जाता प्रमिलित//

क्षणिक आह्लाद का  गह्वर पाश,
संयत जीवन को कर देता बाधित/
हो प्राप्त यदि वह चिर आह्लाद ,
पूर्ण हो पथ, जिस हेतु है सम्पादित //

पाकर मिथ्या को हर्षित है प्रत्यक्ष से,
यह तो भ्रम मात्र है अंतस का/
प्राप्त हो जब वह यथार्थ भविष्य जो ,
जीवन परिष्कृत हो तापस का /

जीवन की यह मिथ्या एषणा,
कृतिका को देती दृढ सम्बल /
सघन हो जाती व्यथा बीथिका ,
विवृत्त होती तमीशा प्रबल /

क्षणिक हर्ष पश्चात सघन विषाद,
और कृतिका का कुटिल तांडव/
होकर पंथ त्यक्त चिर आह्लाद से,
कर्म पथ से होकर पराभव/

हो प्राप्त जो चिर आह्लाद जीवन से,
श्रांत पथिक को मिले पूर्ण विराम /
कृतिका का अवगुंठन हो उन्मीलित ,
हो पूर्ण लक्ष्य जो साश्वत अभिराम //

शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

"आंगन में धूप खिली है "


बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

फैला था कुहरा 
अति घनघोर ,था चतुर्दिश 
शीत लहर का शोर ,
कुहासे के छटने पर ,
सूरज ने ऑंखें खोली है ....
बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/


शिशिर रातों के 
हिम पाटों में 
शीत से व्याकुल हो 
तप-तप टपकती 
जल की बूंदों से 
निशा में आकुल हो हमसे आज करती 
प्रकृति भी यूँ कुछ 
ठिठोली है............

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

देख कर जलद
उड़ते गगन में
आम्र कुंजों में मग्न हो,
नाच उठे मयूरी /
सितारों जड़ी ओधनी 
ओढ़ के धरा पर 
आयी  हो शाम सिंदूरी 
मानो शृंगारित  हो 
नव वधू प्रिय मिलन को चली है.........

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

पौधों पर नव कलियाँ 
खिल-खिल कर झूम रही ,
सरसों की अमराई में
तितलियाँ फूलों को चूम रही 
मानो प्रकृति ने आज धरा पर 
पीली चूनर डाली है ..........

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

नभ में गूँज रहा
विहगों का कलरव 
खिला हुवा अम्बुज है 
ज्यूं सरिता का कुल गौरव 
निज योवन कि अंगड़ाई  में
निस्त्रा भी मचली है.............

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

न ग़ज़ल समझे न गीत समझे

मेरे  हालात को  न  ग़ज़ल समझे 
न गीत समझे ,..........!

वख्त का था क्या तकाज़ा................2
न कोई जज़्बात समझे ,
न रीत समझे ............! 

ये गुज़रे कल के ज़ख्म हैं ................२
जिन्हें न हमदम समझे,
न मीत समझे.................!

दिल कि बाज़ी में हार गये...............२
फिर भी न हार हम समझे,
न जीत समझे ................!

बाद मुद्दत के आये अश्क.................२
इन्हें न फाजिल समझे,
न प्रीत समझे.............!

मेरे  हालात को  न  ग़ज़ल समझे
न गीत समझे ,..........!

बाद बिछुड़ने के..........

बाद बिछुड़ने के हुआ मालूम ,
वो मेरे कितने करीब थे !

था मै नाचीज़ उनके लिए पर,
मेरे लिए वो नसीब थे  !

गैरो में गिनता था खुद को ,
पाया तो वो बड़े अज़ीज़ थे !

थी जो दिले - जागीर पास मेरे ,
लूटे तो सबसे गरीब थे  !

बाद बिछुड़ने के हुआ मालूम ,
वो मेरे कितने करीब थे !

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