रविवार, 20 नवंबर 2011

अभी तो आये हो ,

अभी तो आये हो ,
और आते ही जाने की बात कह दी

कई लम्हातों के  शिकवे तुमसे है करने हमे ,
मुद्दतो के वो गिले तुमसे हैं कहने हमे 
दिल अभी भरा नहीं ..........
और दिल दुखाने की शुरुवात कर दी !
अभी तो आये हो ,
और आते ही जाने की बात कह दी

आँखों का है शिकवा हमें दीदार नहीं मिलता ,
मेरे चैन का है गिला ,मुझे करार नहीं मिलता ,
और क्या खे तन्हाई ...........
तुमने जो रुसवा हो जाने की बात कह दी  !
अभी तो आये हो ,
और आते ही जाने की बात कह दी

मेरी तमन्नाओं को न अधूरा छोड़ कर जाओ ,
ख्वाब ही सही तुम ,यूँ न मुह मोड़ कर जाओ,
अभी तो याद अये हो...............
और तुमने भूल जाने की बात कह दी  !
अभी तो आये हो ,
और आते ही जाने की बात कह दी !

मुझे न तुम याद आओं .........

सावन के झूलों -----
मुझे न तुम याद आओं  
बागों में वादियों की वो छटाएं,
शामों में घाटियों की वो घटाएं/
मुझे न तुम याद आओं .........
ऐ वो बिछुड़ी कलियाँ ,ऐ वो फूलों 
सावन के झूलों -----

भीग जाते हैं मेरे सूने नयन ,
याद करके तुम्हारी प्यारी चितवन /
मुझे न तुम याद आओं .........
ऐ मेरी बीते कल की वो भूलों 
सावन के झूलों ...........

कहाँ गये तुम और तुम्हारे वादे,
किस कयामत के है अब ये इरादे 
मुझे न तुम याद आओं .........
ऐ मेरे व्यथित व्यथा के वो शूलों
 सावन के झूलों ...........

अमरता !

अय, अमरते तू !
क्यों कर लुभाती है ?
इन चिर श्रमित ,
नीरस प्राणों को
झकझोर हिलाती है/

मृत्यु के गह्वर रहस्य से,
क्षण भर को ही
भिग्य तो होने दे!
अनंत के सास्वत लक्ष्य से,
इस अत्न को ,
विज्ञ तो होने दे /

निर्वाण के अनसुलझे
चिर रहस्य को क्यों
अब और उलझाती है ?
अय, अमरते तू !
क्यों कर लुभाती है ?

अन्तर्द्वन्द्व

अन्तर्द्वन्द्व उद्वेलित करता 
अंतर्मन को,
क्या? 
इस निबड़े तम पश्चात 
निशा के व्यतीत होने पर,
अरुणोदय की लाली 
पुन: शृंगार करेगी 
इस धरा का?

या यूं ही 
निराशा की इस निशा में 
निशांत के नक्षत्र सदृश्य ,
आशा का आभास 
हो जायेगा अदृश्य!

क्या कल्पना -
कल्पना ही रहेगी
या होगी साकार?

क्या अत्क की 
स्वर्णिम रश्मियाँ 
धरा के कंठ में 
नहीं डालेंगी  मुक्ताहार ?

क्या श्रांत हो चला वह भी -
निमीलित कर लो चक्षु ,
अब प्रकाश अर्थ हीन होगया !

ठहरो !
वह देखो दूर कहीं,
टिमटिमा रहा है ज्योतिपुंज ,
प्रतीक्षा में वह 
प्रकाश का परिचय करा रहा है!

अरे! हाँ देखो,
प्राची से कुछ बधूटिकाएं 
शृंगार थाल लिए 
चली आ रहीं हैं 
धरा की ओर,
करने को शृंगार,
डालने को मुक्ताहार !

अवगुंठन हटा दो,
स्वयं को जागृत करो,
अब निशा छटने वाली है 
वह देखो दूर 
वहाँ क्षितिज पर 
आशा की पौ फटने वाली है !
                                        


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