शनिवार, 31 दिसंबर 2011

अभिलाषा !

काम आऊं दूसरों के,
दर्द बांटूं मैं उनके,
मानव का कल्याण करूं ,
मेरी यह अभिलाषा है !

कभी न बुरा सोंचूं मैं,
किसी का बुरा न करूं ,
जीवन यथार्थ करूँ मैं,
मेरी यह अभिलाषा है ! 

मानवता का त्राण हरूं,
नव युग का विश्वास बनूँ,
पर हित का प्रयास करूं ,
मेरी यह अभिलाषा है !

किसी का मन न दुखे
किसी को दर्द न पहुंचे
मैं कर पाऊँ  कुछ ऐसा
मेरी यह अभिलाषा है ! 

भूख मिटे जो उदर की
खाए न ठोकर दर-दर की,
मिलजाय सबको ये सब ,
मेरी यह अभिलाषा है ! 

युद्ध लड़ना तो व्यर्थ है
प्रेम से जीते तो अर्थ है ,
भूलें सब भेद-भाव अब ,
मेरी यह अभिलाषा है ! 

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

असत्य, अस्तित्त्व सत्य का



 असत्य
जिसने बदला इतिहास,
जिसके होने पर होता है 
सत्य का परिहास!

असत्य,
रखते हुए अस्तित्त्व,
करता सत्य को साकार;
सत्य का जब हुआ उपहास,
असत्य से ही मिला प्रभास!

किचित
असत्य नहीं  होता यथार्थ!  
परन्तु, सत्य के महत्त्व का 
आधार है यही असत्य,

हम अब भी सत्य  
असत्य  के महत्त्व के मध्य,
हैं  विभ्रमित और विस्मित !

इस पार है असत्य ,
उस पार वह प्रत्यक्ष ,
सत्य !!

व्यथा !

दोस्तों मेरे हालत और गम न पूँछो;
कैसा है हाल अब न ये सनम पूँछो!

बारूद से जोड़ा है इमारत का हर पत्थर,
बैठा हूँ किस ऐटम पे ,ये  बम न पूँछो!!

सिसकियाँ हैं जो दिल में ही सिसक रहीं;
सब पूँछो मगर दास्ताँ -ए- सितम न पूँछो!

दहल उठेगी ये दुनिया तुम्हारी, यारों!
चुप रहो, खुद के दिए हुए जख्म न पूँछो!

मेरे अपनों ने किया है जो ए हश्र आज,
कैसे हुआ वीरान मेरा ये चमन न पूँछो!!

कहते हैं लोग मुझे, ये मेरा देश है ,अरे!
होता है क्या, लोगों से ये "वतन" न पूँछो

विनम्र निवेदन !

                                           
   
                  आप सभी भारतीयों व् भारत से प्रेम करने वालों से मुझे एक जानकारी चाहिए कितने लोग सम्पूर्ण विश्व में हिंदी नव वर्ष का पेव मानते हैं? या लोगों को शुभकामनायें प्रेषित करते हैं ?शायद आप विश्व की बात छोड़ दें कितने भारतीय हिंदी नव वर्ष के विषय में जानते हैं !
   
                   मैं किसी संस्कृति विशेष का विरोध  नहीं करता ,वरन पक्षधर भी हूँ , सभी को अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए और दूसरों  की संस्कृति के साथ स्वयं की संस्कृति का भी ध्यान रखा जाय!

जब तक हम स्वयं अपनी संस्कृति का सम्मान नहीं करेंगे तब तक दूसरों से क्या आपेक्षा की जा सकती है

                  आईये हम सब मिलकर संकल्प लें की हम स्वयं की संस्कृति की समृद्धि व् विकास में यथा शक्ति प्रयास व् सहयोग  करेंगे!

                    देश, भाषा व् संस्कृति का अपमान सहना जीते जी मृत्यु के समान है, जरा सोंचें यदि  कोई आपके जन्मदाता, पालनकर्ता का अपमान करे तो क्या सहनीय होगा!शायद नही बल्कि उसके प्रति शत्रुभाव जागृत हो उठेगा !

                        लेकिन आज शायद हमारा लोभ या सोंच हमें विवश कर देता है कुछ अनचाहा करने के लिए, न जाने ये कैसी विडम्बना है की जिस देश के लोग विश्व स्तरीय चिन्तन, शोध व् ढृढ़मनस्क  थे वही आज मात्र धनार्थी, स्वार्थी और  निर्लज्ज लोग  स्वयं का ही व्यर्थ उत्थान करने में लगे हैं !

     

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

प्रलय और सृजन

एक नीड़ उजड़ा फिर से,
झंझा के भीषण प्रभंजन में,
 प्रलय की परिभाषा
पुनह दोहराई गयी.
एक संकीर्ण सभ्यता में
जीवन मृत्यु से लड़ा!
विजय फिर से
छीन कर लाई गयी ;

फिर-फिर बवंडर उठे,
प्रभंजन के प्रवाह में
सहस्रों नीड़ उजड़ गये,
सभ्यताएं खड़ी की गईं;
सृजन की नीवं डालकर,
रचना गढ़ी गयी

कितनी बार उजड़ेंगे,
इस वीभत्स विध्वंस से ;
हम बार-बार लड़ेंगे ,
प्रलय के चक्रवात
चलते रहेंगें
हर बार वही लड़ाई
लड़ी गयी

जरा सोंचें !



आज कल लोग अपना काम केवल बातें बना देने से मतलब तक रखते है


पर यथार्थ की गहराई में कोई नही जाना चाहता , सभी महान बनाना चाहते हैं पर किसी वस्तु का समर्पण

करना हो तो उन्हें अपना पेट दिखाई देने लगता है कोई फेसबुक पर अपनी भडास निकालता हिया तो कोई

 समाचरपत्र में लम्बा चौड़ा लेख लिख कर , पर कोई भी देश की व् देश के नागरिक और उसकी संस्कृति की 

परवाह नही करता ,यह सब केवल दिखावे की बातें है. फालतू की बातें करनी बंद करें और यदि वास्तव में 

कुछ करना कहते हैं तो सबसे पहले खुद को भ्रष्टाचार से मुक्त करें और खुद अपने देश और संस्कृति का 

सम्मान करना प्रारम्भ करें ! 


इस बात पर अवश्य विचार करें की हम अपनी संतानों को शिक्षा और शिष्टता सिखाना चाहते हैं पर जब बात 


व्यक्तिगत होती है तो सारे सिद्धांत किनारे कर देते है/काश !हम सब की सोंच में सुधार हो जाय और खुद को 


बदलने लगें तो परिवार ,समूह और देश भी बदल 


सकता है ! हर एक को इस पावन कार्य के लिए आगे आना चाहिए पर सबसे पहले अपनी सोंच को सर्व 


कल्याण कारी बनाना होगा तभी हम अपना और देश व् समाज का भला कर सकते हैं !मीडिया भी अब मुद्दों से


 अपनी रोटियां सेंकती है/हर एक चैनल का मालिक अरबपति है और केवल यही चाहता है की नित नई 


घटनाएँ हों और हमें मुद्दे मिलते जाएँ पर वास्तव में कोई भी सुधार नही चाहता !

पतिता

जिश्म को बेंच कर,
वह पालती उदर;
पतिता कहाती वह,
पर क्या वह पतिता ही है?
क्यों,कैसे पतित हुयी,
सहयोग तुम्हारा भी तो है!
बनाने को पतिता,
तुमने ही विवश किया;
फिर उसको यह नाम दिया ,


चंद चंडी के टुकड़े,
बनाते मिटाते 
उसके अस्तित्व को 
तुम्हारी भूख में 
वह सेंकती रोटियां;
भूख मिटाने को
वह लुटाती नारीत्व  
नारी बचाने को/

वासना भरी आँखें ही 
हर तरफ दिखीं,
घर - परिवार
और समाज 
सब बहसी लगें
कहाँ जाय 
किस-किस से बचे
हर तरफ दरिंदगी दिखे!

पर करती जो
समाज को पतित;
क्या वो पतिता ही
कहलाती हैं?
आज भी लज्जित होता
 समाज उनसे,
फिरभी सभ्यता की भीड़ में 
वो सभी ही 
कही जाती हैं!!


तपिश


कितनी सुर्ख
 हो रही धूप,
शीतल हो चुका;
 अब सूरज
सारी उसकी गर्मी 
समा गयी ,
इस पुरानी
 सर्द धूप में! 

जब घुटन ने
 घोंट दिया दम 
 का ही गला,
तो घोंटने को
दम घुटन
 कहाँ जाय !

लाल आग को 
पीकर चल पड़ी ,
जाड़े की रातें;
लीलने उस जाड़े को
जिसके आते ही
जाग पड़तीं  थीं,
वो सर्द रातें!!

हम क्या हैं ?

अजीब दास्ताँ है,
इस अजीब दुनिया के
 अजीब लोगो की ;
कुछ के पास 
वस्त्र नहीं 
और कुछ,वस्त्रों से 
वास्ता ही नही रखना चाहते,
शायद 
ये किसी का शौक 
और किसी की 
मजबूरी होती है,
ठीक 
इसी तरह 
कोई भूख  से
तो कोई 
भोजन से 
वंचित रहता है 
और 
जिनके पास 
सीमित साधन और
आवश्यकताएं हैं,
वो इन अजीब लोगों के
शौक और मजबूरी पर 
बेचैन हैं/
अब विचार करना है 
हम और आप 
क्या हैं ?

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

चिर प्रश्न

जीवन ,
एक वह सत्य है ;
जिसे जी कर भी न 
जाना जा सका 
और 
मृत्यु पश्चात 
तो है 
चिर रहस्य !
पर 
अभी भी
युग पुरुष 
कर रहे है प्रयास,
जानने को
जीवन की सार्थकता ,


क्या 
जन्म और मृत्यु ,
मात्र भ्रम हैं 
या किसी सृजेता का 
कल्पनामयी 
स्वप्न !
प्रत्येक जीवन
इसी उहापोह में 
बीत जाता है ,
और 
चिर प्रश्न 
प्रश्न  ही बने रहते है!



मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

जीवन

यह लघु जीवन कितना विशाल!

                          पग-पग पर मिलते चौराहे,
                          हर पथ पर मन जाना चाहे.
                          है जिसको यह जग ठुकराए,
                          भ्रमित पथिक किस पथ  जाए/
खाकर ठोकर हुआ बेहाल !
यह लघु जीवन कितना विशाल!

                                              बनते-मिटते सपने मन के;
                                              हंसते-रोते पल जीवन के,
                                              कितनी पथरीली ये राहें;
                                              स्वागत को फैलाये बाँहें :
              हर पल उलझता माया जाल'
              यह लघु जीवन कितना विशाल!

                             सुलझे जितना उलझे जीवन,
                             हर पल होता है घायल तन;
                             प्रतिक्षण होता विक्षिप्प्त अंतर्मन; 
                             होता रहता  मात्र हृदय वेदन;
कितना निठुर क्रूर काल व्याल,
यह लघु जीवन कितना विशाल!

तुम कहाँ हो ?

प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो? 
मेरी क्षति के किनारे,
मेरे जीवन के शेयर;
तन मन मेरे,  तुम कहाँ हो? 
प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो? 

मन के नूतन अभिनन्दन !
सुंदर जीवन के नवनंदन,
प्राण धन मेरे, तुम कहाँ हो? 
प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो? 

जीवन के नूतन अभिराम,
मन मंदिर के प्रिय घनश्याम,
प्रेम बंधन मेरे  तुम कहाँ हो? 
प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो? 

ढूढ़ते जिसे ये सूने नयन,
पुकारे जिसे ये प्यासा मन;
समर्पण मेरे, तुम कहाँ हो? 
प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो? 

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

भिक्षुक

लड़खड़ाते   कदमों से,
लिपटा हुआ चिथड़ों से,
दुर्बल तन, शिथिल मन;
लिए हाँथ में भिक्षा का प्याला !
वह देखो भिक्षुक सभय,
पथ पर चला आ रहा है/

क्षुधा सालती उदर को,
भटक रहा वह दर-दर को,
सभय समाज का वह बिम्ब;
जिसमें उसने जीवन ढाला,
खोकर मान-अभिमान,
पथ पर चला आ रहा है/

हर प्राणी लगता दानी ,
पर कौन सुने उसकी कहानी,
तिरिष्कार व घृणा से,
जिसने  है उदर को पला ;
घुट-घुट कर जीता जीवन,
पथ पर चला जा  रहा है/

हाँथ पसारे, दाँत दिखाए,
राम रहीम की याद दिलाये;
मन को देता ढाढस;
मुख पर डाले ताला,
लिए  निकम्मा का कलंक,
पथ पर चला जा  रहा है/


रविवार, 25 दिसंबर 2011

अतीत की स्मृति लहरी

अतीत की स्मृति लहरी ,
क्यों कर तरंगित होती है?
निशीथ की इस बेला में,
क्यों व्यथा व्यथित बोती है/

पान्थ है जब पथ पर गतिज,
फिर क्यों यह बाधित होता है?
व्यतीत काल के कलरव से,
क्यों यह अंतस व्यथित होता है?

 वेदना की व्यथा से होकर व्यथित ,
 लक्ष्य पथ से क्यों हो रहा विचलित/
 क्या कर्म पथ था त्रुटिपूर्ण जो अब
 निर्वाण पथ से कर रहा विछ्लित/


क्या कुछ शेष रहा विशेष जो,
 करता तनमन को तपित,
 इस अटवि में आकर भी तू
 भ्रमित, तृषित सा है शापित


जीवन के निर्जन कानन में ,
 करता था नित नाव नंदन /
 श्रृद्धा पूर्ण था जीवन समर्पण ,
 भावना पूर्ण था देव वंदन /


था शांत स्थिर तटस्थ पर,
 करता था नूतन अभिनन्दन /
 सुख-दुःख ,राग द्वेष से हीन,
 मधुकामना से निर्लिप्त मन /


निष्पादित अश्रांत जीवन ,
 निर्वेद के रह्स्योंमीलानोद्यत /
 करता था मैं जीवन तपस्कर,
 लक्ष्य संधान हेतु था उद्यत /


जीवन लक्ष्य था मात्र निर्वाण ,
 कर्तव्य पथ पर था प्रबाध/
 गतिमान था महाकाल का चक्र ,
 आशा पूर्ण था जीवन निर्बाध /


जीवन की इस निशीथ बेला में ,
 क्यों विस्तृत होता कृतिका विवृत्त /
 है क्या शेष विस्मृत विशेष?
 या की रह गया जीवन निवृत्त !


स्मृति व्यतीत की जीवन को,
 कर देती है जब विकल /
 अंतस के गह्वर तम से ,
 विह्वल होता उर सकल /


स्मृति अतीत की कर देती स्पंदन तीव्र ,
 उर प्रांगण को कर उद्वेलित विह्वल /
 कर्म पथ पर पथिक हो जाता भ्रमित ,
 अप्राप्य की तृष्णा हो उठती तीव्र प्रबल /


इन वासित स्मृतियों में ,                                                    
 क्यों यह वेदना है पलती ?
 अश्रुओं की निस्त्रा क्यों कर ,
 है दृगांचल में मचलती ?

 ज्यों एक प्रस्तर खंड तड़ाग के ,
शांत तोय को कर देता है तरंगित /
 ज्यों वरिदों के घर्षण का गर्जन ,
 जड़ चेतन को कर देता है कम्पित/
जाने क्यों होताहै स्मृत अतीत,
कुछ रहा शेष अब जीवन व्यतीत/
तृष्णा तृप्त हुआ, था जिज्ञाषा हीन,
आश्रांत था तन, निः श्वास समाधिलीन/

जाने कैसी आह वेदना की,
अब पुन: उर में उपजती है?
इस निर्जन अटवी में क्यों,
स्मृतियों की रागिनी बजती है?
स्थिर नीरस जीवन में वो स्मृतियाँ,
निस्तब्ध निशा में भी शोर फैलाती हैं/
निशांत के नक्षत्र सी द्युतिआछिन्न ,
प्राण चेतना को झकझोर हिलाती हैं/

 पन व्यतीत हुए,वर्ष व्यतीत  हुए ,
व्यतीत हुआ शोक विषादों का चक्रवात /
कितनी आयी होंगी जीवन में आंधियां,
कितने  व्यतीत हुए भीषण झंझावत/

पर न कोई शेष चिह्न था ऐसा ,
उन स्वर्णिम पलों की स्मृति जैसा /
वो तरुणाई प्रभात का अरुणोदय थी,
मुकुलों के संग मुकुलित किसलय थी/

कुछ स्मृतियाँ शेष होंगीं,
उन्हें भी जीवन के बीते पल की/
कुछ तीक्ष्ण चुभन होगी,
उनके उर में भी उस पल की/

शेष होंगीं कुछ जीवन की आशें,
अस्थिपंजर में रुकी होंगीं सांसें/
निज कानन में वे भी होंगें व्याकुल,
स्मृतियों से वे भी हुए होंगें आकुल/

नव प्रभात का समय नव्य था,
समीप ही सरोवर के/
हो रहा था विहगों का कलरव,
निकट ही तरुवर के/

पी कहाँ! पी कहाँ! पपीहा बोल रहा था,
कोकिल का कलरव गूँज रहा था /
अम्बुज निज यौवन में डोल रहा था ,
मन मृदुल-मंजुल-झूम रहा था /

यौवन कीमदिरा में अत्क झूम रहा था,
क्षितिज पर अत्न धरा को चूम रहा था /
पुहपों से ले सुगंध समीर भ रहा था,
ऋतुराज से कुछ श्रृंगार भी ख रहा था /

दैदीप्य मान था उसका आनन्, 
निर्झर झरते थे सघन वन में/
आशा की मानो आदि जननी,
सुषमा  संवर रही थी कानन में /

प्रकृति सुषमा बैठी सजधज कर युऊँ,
रजनी ने वसुधा का श्रृंगार किया हो:
जीवन भर का नंन्दन संवरता वहाँ,
अलसाई कोपलों ने मनुहार किया हो/

नंन्दन कानन में  कुछ पुहुप खिले थे,
पौधों पर अधखिली कलियाँ भी थीं/
उन पर भ्रमर करते थे नित गुंजन,
मकरंद पान हेतु कुछ तितलियाँ भी थीं/

समीर भी प्रकृति की वीणा को ,
रह-रह कर झंकृत कर रहा था/
मृगांक भी निज ज्योत्स्ना से,
धरा को अलंकृत कर रहा था/

अलकों की विवृत्ति में उलझ रहा था;
तृष्णा की तपिश में झुलस रहा था/
पथ से हो भ्रमित मैं लक्ष्य हीं था ;
दयनीय था मैं अति क्षम्य दीन था/

सौन्दर्य श्रृंगार की परिभाषा से अनिभिग्य;
था मैं मात्र स्नेह पात्र अतिगव अविग्य/
अलिम्क सदृश्य मैं प्राग का रागी था;
उनके ही अनुरंजन का मैं अनुरागी था/

जीवन के कुछ पल मैंने भी
उनके आंचल में व्यतीत किये थे/
उनके आलिंगन के बंधन,
तरुन्लता  को आश्रय प्रतीत हुए थे/

नित नव नूतन कल्पनाएँ,
बनती संवरती रहती थीं/
जीवन की स्वप्निल आशाएं ,
नित नव उमंगें भरती थीं/

मानस  पटल पर सुंदर-सुंदर
प्रतिबिम्ब उभरते जाते थे/
क्षण प्रति क्षण एक-एक स्वप्न,
त्रण-त्रण हो, बिखरते जाते 









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