शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

शहीदों की माँ !

गाँव के अंतिम छोर पर
था एक टूटा हुआ
माटी का घर !
जिसमे रहती थीं
एक बूढी माँ !

आज उन्होंने छोड़ दिया
वह घर और संसार !
जिसके लिए उन्होंने
किये थे कुर्बान
अपने चार जवान बेटे !

सुना है वो बेटे
शहीद हुए थे देश की
आन और सम्मान
को बचाने में !


पर माँ हो गयी थी
बेबस और लाचार;
यूँ ही झूठा एक तमगा
मिल गया था उसे
जीने के लिए !

जो नहीं मिटा सकता था
उसके पेट व जरूरतों की
भूख और मांगो को !

घिसटते-घिसटते
बिता दिए थे उन्होंने
पूरे चालीस साल !

कोई नहीं पूछने आया
उस माँ की विवशता का
कारण और दिखाने
समाधान का रास्ता !

क्यों किसी के सामने
फैलाती अपने दीन हाँथ
आखिर वह थीं तो
शहीदों की माँ !


( शत -शत नमन ऐसी ही अनगिनत माँओं के त्याग को और उनकी अपार सहनशक्ति को !)

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