मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

जीवन त्राण

नीरस प्राण
लिए पागल 
मैं कहता हूँ;
ठहर तो सही 
पल दो पल के लिए !

कितना चला 
चलकर भी 
न थका अब ,
है व्याकुल तू ,
किस नभ - थल के लिए!

उलझ रहा 
राग-द्वेष के 
मिथ्या रस में ;
भ्रमित भटकता 
तृष्णा में जल के लिए !

अश्रांत जीवन 
व्योमोहित मन ,
लिए व्यर्थ व्यथा ;
व्यथित है तू 
अनिश्चित कल के लिए !

खोकर प्राप्य
खोजता अज्ञेय ;
सोंच तनिक जो
क्यों चिंतित है 
अदृश्य फल के लिए !

नीरस प्राण
लिए पागल
मैं कहता हूँ;
ठहर तो सही
पल दो पल के लिए !




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