गुरुवार, 21 जून 2012

आदमी !

घर की पुरानी दीवारों सा,
अब ढहने लगा है आदमी !

बहुत ढो चुका रिश्तों का बोझ,
अब दबने लगा है आदमी !

जिन्दगी के हादसों में टूटकर 
बिखरने लगा है आदमी !

अपनों में रहकर भी अजनबी 
सा  लगने लगा है आदमी !

घर की पुरानी दीवारों सा,
अब ढहने लगा है आदमी !

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