बुधवार, 27 जून 2012

अपवृत्त !

अंतस को तापित करती है,
यह विदग्ध ज्वाला !
स्निग्ध हो उठे ह्रदय.
दे दो वह अमिय मय हाला !! 

ये है जीवन की तृष्णा,
जो करती व्योमोहित पान्थ को !
हो निर्लिप्त कर लक्ष्य संधान,
 हेतु व्यथित न कृत्यांत हो !!

कुटिल काल चक्र के काल-व्याल से,
क्या कुछ अच्क्षुण रह पाया है !
श्रांत जीवन की आहात सांसों से ,
कौन निर्वाण पथ पूर्ण कर पाया है !

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