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दौर-ए- मुफलिसी !

मुफलिसी का दौर कुछ इस कदर चला,
आदमी न जाने कौन-कौन सी डगर चला !!

मुसीबतों का जो फिर सिलसिला चला,
जिन्दगी में रंज-ओ-गम का जलजला चला !
फिर भी कर वो पूरा सफर चला .............
आदमी न जाने कौन-कौन सी डगर चला !!

कदम-कदम पर सबर का इम्तिहान चला,
मुकद्दर के हांथों मजबूर हो  इंसान चला !!
भटकते-भटके वो मगर चला .............!
आदमी न जाने कौन-कौन सी डगर चला !!

जहाँ में जिन्दगी को बिखेरता चला ,
अपनी ही उलझनों को समेटता चला !
करके वीरां अपने  दीवार-ओ-दर चला......!
आदमी न जाने कौन-कौन सी डगर चला !!

              

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "