मंगलवार, 31 जनवरी 2012

तुम्हारी बोझिल सांसों की ये धरोहर!

बीती हुयी  जिंदगी
जो थी मेरे हिस्से की  ;
जी चुका  हूँ ,
खुशियों के झूंठे
मादक प्याले
पी चुका हूँ !

अब बची हैं जो कुछ
मुट्ठी भर सूखी सांसें ;
इनको जीने के लिए,
मरता हूँ हर पल;
कब बीत गया  ये क्षणिक
पर लम्बा जीवन!
बीत गया या आने वाला है;
आगत-विगत कल !

अब विवश हूँ!
नहीं ढ़ो पाऊँगा ;
तुम्हारी  बोझिल
सांसों  की ये धरोहर!
अब समेट लो;
अपनी बाहें फैलाकर;
ये सांसें और जीवन;
जो तुम्हारा है,
कर लो लीन अपने  भीतर!!

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

ये प्राण बड़े ही निठुर और नीरस हैं !

ये प्राण बड़े ही 
निठुर और नीरस हैं !
किस पर इन्हें
समर्पित किया जाय !


कब छोड़ चले जाएँ 
इन माटी के मटके 
से बिन पर उड़ जाएँ !

कर लो कुछ ऐसा 
जो ये क्षुण  जीवन 
बन सार्थक जाय !

अर्थ निरर्थक है 
सब कृतिका में !
मृग मरीचिका के 
तृषा जाल से 
समय पूर्व बच जाय;

सब रंग बेरंग हैं ,
जीवन दर्शन नहीं 
साश्वत और सत्य है 
लेकिन जिया जाय !


हर मृत्यु करती 
सुप्त को जागृत ,पर
हर समय स्वयं 
होता भ्रमित 
क्या मेरा भी होगा अंत 
इसे भी जान लिया जाय !

ये प्राण बड़े ही
निठुर और नीरस हैं !
किस पर इन्हें
समर्पित किया जाय !

  

बुधवार, 25 जनवरी 2012

जन्मभूमि

आजादी मिली नहीं,
छीन कर दिया है
या कहें कि 
मोल चुकाया है 
देकर अपना  जीवन 
लुटा कर अपनी 
खुशियाँ और 
अपना चैन -ओ- अमन !

लेकिन कुछ पल 
याद कर लेना 
उनकी शहादत ,
चुका दिया हमने 
उनके अनमोल
जीवन की कीमत !

भूल जाते हैं हम 
आज गुजर रहा है जो 
ये जैसा भी जीवन ,
क्या रहकर गुलाम 
जी पाते ,और रह पाते 
सुरक्षित और सम्पन्न !

अरे याद कर लेने भर से 
नही बची रह पायेगी 
ये दी हुयी उनकी 
आजादी की धरोहर !
हमें भी करना होगा कुछ 
जिससे बची रहे 
ये आजादी और 
कर सकें कुछ सुरक्षित 
भारत का निर्माण !

आज जो नन्हा भारत 
जन्मा है इस धरा पर 
जी पायेगा इस 
जीर्ण- क्षीर्ण समाज 
की वीभत्स संरचना में !

बचा लो इस अपनी 
जन्मभूमि को जो 
आज भी तरसती आँखों से 
और दयनीयता से 
आसरा लगाये हुए है 
अपने जवान बेटों से !

जननी और जन्मभूमि
जीवन में हैं सबसे महत्त्व पूर्ण 
 हमें इनकी सेवा तन, मन 
और सम्पूर्ण समर्पण से
 करनी होगी!   

"हर भारतीय के लिए चुनौती

 "हर भारतीय के लिए चुनौती " *

सन् 1836 में लार्ड मैकाले अपने पिता को लिखे एक पत्र में कहता है:
"अगर हम इसी प्रकार अंग्रेजी नीतिया चलाते रहे और भारत इसे अपनाता रहा तो आने वाले कुछ सालों में 1 दिन ऐसा आएगा की यहाँ कोई सच्चा भारतीय नहीं बचेगा.....!!"
(सच्चे भारतीय से मतलब......चरित्र में ऊँचा, नैतिकता में ऊँचा, धार्मिक विचारों वाला, धर्मं के रस्ते पर चलने वाला)

भारत को जय करने के लिए, चरित्र गिराने के लिए, अंग्रेजो ने 1758 में कलकत्ता में पहला शराबखाना खोला, जहाँ पहले साल वहाँ सिर्फ अंग्रेज जाते थे। आज पूरा भारत जाता है।
सन् 1947 में 3.5 हजार शराबखानो को सरकार का लाइसेंस.....!!

सन् 2009-10 में लगभग 25,400 दुकानों को मौत का व्यापार करने की इजाजत।

चरित्र से निर्बल बनाने के लिए सन् 1760 में भारत में पहला वेश्याघर कलकत्ता में सोनागाछी में अंग्रेजों ने खोला और लगभग 200 स्त्रियों को जबरदस्ती इस काम में लगाया गया।

आज अंग्रेजों के जाने के 64 सालों के बाद, आज लगभग 20,80,000 माताएँ, बहनें इस गलत काम में लिप्त हैं।

अंग्रेजों के जाने के बाद जहाँ इनकी संख्या में कमी होनी चाहिए थी वहीं इनकी संख्या में दिन दुनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है !!

आज हमारे सामने पैसा चुनौती नहीं बल्कि भारत का चारित्रिक पतन चुनौती है।
इसकी रक्षा और इसको वापस लाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए !!!

॥ जय हिन्द ॥ जय जय माँ भारती ॥ वन्दे मातरम् ॥

॥ जय हिन्द ॥ जय जय माँ भारती ॥ वन्दे मातरम् ॥

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

त्याग !


समर्पण की परिभाषा
जानना कहते हो !
क्या होता है
समर्पण का अर्थ !

पर कौन याद करता है,
ऐसे समर्पण को !
शायद कभी
जब भूल से याद आ जाता है
कभी अपना स्वार्थ
तो कर लेते हैं क्षण भर
स्मरण और फिर भुला देते हैं
उनका समर्पण ,त्याग
और बलिदान !

दया की वो देवी
जिसने बीमारों , घायलों
और जरूरत मंदों के लिए पूरा
जीवन समर्पित कर दिया!

नाम तो कोई भी दे सकते हो
चाहे पन्ना धाय
कह लो
या Florence Nightengle !

सोमवार, 23 जनवरी 2012

संपूर्ण स्वतंत्रता : भ्रम या यथार्थ:


इस परिचर्चा  शामिल सभी मनीषियों से क्षमा याचना मांगते हुए उनके विचारो को संकलित कर  रहा हूँ , 






आज मित्र आशुतोष कुमार ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को अपना स्टेटस बनाकर, बिना कहे, पिछले दिनों देश में इस मुद्दे पर बढ़ी बौद्धिक सरगर्मी को ज़ुबान दी. पूरी पृष्ठभूमि से आप सब वाकिफ़ हैं. इसलिए उसे दोहराना आप सबका वक़्त ज़ाया करने जैसा होगा.






"क्या सचमुच कोई कहने की मुकम्मल आज़ादी का समर्थक है ?लेकिन जो कोई भी बेहूदगी , भावनाओं ( खास कर धार्मिक ) पर चोट और क़ानून के नाम पर कहने की आज़ादी पर प्रतिबन्ध के लिए किसी न किसी हद तक राजी है , उस से केवल एक सवाल है !उन तमाम धार्मिक पुस्तकों का क्या होना चाहिए , जिन में इस या उस तरीके की बेहूदगियों तथा नास्तिकों-असहमतों -मेहनतकशों और औरतों की भावनाओं को चोट पहुंचानेवाली बातों की कोई कमी नहीं है ?....चाहे ऐसा मेरी और मुझ जैसे कुछ जाहिलों की नज़र में ही क्यों न हो . भावनाएं तो हम जाहिलों की भी होती होंगी!" इस पर मैंने यह टीप की थी.






"मैं अपने आपको आप वाली पांतों (जाहिलों की) में खड़ा पाते हुए भी इस/ऐसे समाज में "मुक़म्मल आज़ादी" को एक खयाल से ज़्यादा और अलग नहीं देख पाता. मुझे लगता है मेरी/आपकी भावनाओं को चोट पहुंचने को कोई ख़ास अहमियत मिलने वाली नहीं है: न इस कोने से, और न उस कोने से. मामला सिर्फ़ धर्म का न भी हो तो भी बंटे हुए समाजों में (चाहे धर्म के नाम पर अथवा वर्ग के नाम पर) जिनके हाथ में राजनैतिक/धार्मिक सत्ता है, वे ऐसी आज़ादी की इजाज़त देने वाले नहीं हैं. और यूं भी आज़ादी सापेक्ष से ज़्यादा कुछ हो नहीं सकती. absolute तो क़तई नहीं. आपको ध्यान होगा लेनिन ने वर्ग समाज में आज़ादी का कितना सशक्त, पर तीखा, रूपक बांधा था. वह अविकल रूप से उद्धृत करने लायक़ है, और मैं देखता हूं, 'क्यों' के किसी अंक में ही शायद मिल जाए तो कल साझा करता हूं."






और लीजिए मुझे, बिना अधिक खोज-तलाश के लेनिन के एक महत्वपूर्ण लेख का वह अंश मिल गया जिसमें वह संपूर्ण स्वतंत्रता संबंधी लेखकीय दावों के छद्म को बेहद निर्ममता से उघाड़ते हैं. आंख में उंगली डालके दिखाना इसे ही कहते हैं.






"उस समाज में कोई वास्तविक और प्रभावकारी 'स्वतंत्रता हो ही नहीं सकती जो धन की सत्ता पर आधारित है, जिस समाज में कामगार जनता दरिद्रता में रहती है और मुट्ठी भर धनी लोग परोपजीवियों की तरह रहते हैं. और लेखक महोदय, क्या आप अपने बूर्जुआ प्रकाशक से स्वतंत्र हैं, उन बूर्जुआ पाठकों से स्वतंत्र हैं, जो आपसे उपन्यासों में और चित्रों में पोर्नोग्राफी की मांग करते हैं और पवित्र नाट्य कला में वेश्यावृत्ति को एक 'परिशिष्ट' के रूप में चाहते हैं? यह पूर्ण स्वतंत्रता एक बूर्जुआ या अराजक शब्दावली है... यह नहीं हो सकता कि कोई समाज में रहे भी और समाज से स्वतंत्र भी हो. बूर्जुआ लेखक, कलाकार या अभिनेत्री की स्वतंत्रता महज़ एक मुखौटा है, जिसके नीचे पैसा, भ्रष्टाचार और वेश्यावृत्ति पर निर्भर रहने की बात को छिपाया जाता है."--


- मोहन श्रोत्रिय









अशोक कुमार पाण्डेय




एक खास परिस्थिति में लिखा गया यह उद्धरण महत्वपूर्ण है. लेकिन जहाँ सामंती मनोवृति फिर से सर उठाने

लगे वहाँ बुर्जुआ लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण हो जाती है. यहाँ हमें यह देखना होगा कि

लेखक की अभिव्यक्ति की स्वततंत्रता को बैन करने वाली ताक़तों का वर्ग-चरित्र क्या है. क्या वे प्रगतिशील

ताक़तें हैं? क्या हुसैन, तस्लीमा, रश्दी, रोहिंटन मिस्त्री.....को बैन करने वाली और उनके बैन की मांग करने

वाली ताक़तें इन लेखकों की तुलना में कम बुर्जुआ या प्रगतिशील हैं










मोहन श्रोत्रिय

बेशक. लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि शासक वर्गअपने से इतर सोचने वालों पर भी अपनी प्रभावी

विचारधारा, जिसे मार्क्स से लेकर तमाम मार्क्सवादी ruling ideology कहते हैं, का वर्चस्व ही क़ायम करती और

रखती है वह तो करेंगे ही. सवाल यहां संपूर्ण स्वतंत्रता का है, जो वास्तविकता नहीं हो सकती वर्ग समाज में. लेखक तमाम वंचित तबकों की मुक्ति की बात के साथ अपनी स्वतंत्रता की मांग करे, यह तो अपनी वर्गीय दृष्टि से जायज़ होगा ही. मार्क्स से लेकर लेनिन तक सब लेखक की विशिष्टता की मांग या आग्रह को खंडित और प्रश्नांकित करते हैं. मैंने ज़्यादा सिर्फ़ इसलिए नहीं कहा क्योंकि मैं भी चाहता हूं कि बहस आगे बढ़े. हमें उक्त मांग पर डटे रहकर अपने आग्रहों की भी समीक्षा करनी होगी






अशोक कुमार पाण्डेयज़ाहिर है
ऐसे में भी एक बुर्जुआ शासन व्यवस्था द्वारा लगाये गए बैन का हम हमेशा विरोध करेंगेअसल में यह सैद्धांतिक अवस्थिति का मामला है जिससे मेरी सहमति है लेकिन एक बुर्जुआ शासन व्यवस्था में इस बहस को उठाना उसे बैन के पक्ष में तर्क उपलब्ध कराना होगा






मोहन श्रोत्रिय इससे किसे इनकार है? लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अधिसंख्य लोग जब मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार पर ही जब "प्रतिबंध" झेल रहे हों, तब अकेले लेखक के अधिकार को रेखांकित करना कितना न्यायोचित होगा? दूसरी बात यह कि अकेले "बैन" का प्रश्न इस "लेनिनीय" उक्ति से कहां निसृत होती है. मेरी मूल टीप में जिस वर्ग-समाज की वास्तविकता को रेखांकित किया गया था, और जिससे तुम्हारी पूरी सहमति थी, उसे इस उक्ति ने कहांसे और कैसे बदल दिया इस सैद्धांतिक अवस्थिति को मौजूदा वर्ग-समाज के बरक्स देखेंगे तो एक ख़ास किस्म की ज़िद से भी मुक्त होंगे, क्योंकि वस्तुगत यथार्थ के साथ उसकी संगति भी देखनी होगी.






आशुतोष कुमार मोहन श्रोत्रिय , लेनिन के इस कोट का पूरा सन्दर्भ दे दिया जाता तो बात करने में सुविधा होती .''वर्ग समाज में कहने की मुकम्मल आज़ादी मुमकिन नहीं है''--इस का यह मतलब नहीं हो सकता कि ऐसी आज़ादी एक मूल्य नहीं है , काम्य नहीं है . बुर्जुआ समाज आज़ादी का इस्तेमाल अय्याशी और उत्पीडन के लिए करता है --इस का भी यह मतलब नहीं कि मुकम्मल आज़ादी का ख़याल अपने आप में ही एक नागवार ख्याल है!. ..अन्याय के खिलाफ लड़ाई आखिर मनुष्य मात्र की आज़ादी के लिए लड़ाई नहीं तो और क्या है . बुर्जुआ आज़ादी को इंसानी आज़ादी में तब्दील करने का संघर्ष समझ में आता है , लेकिन इस का मतलब बुर्जुआ 'गुलामी' की जगह मज़हबी और कबीलाई गुलामी की तो बात क्या 'कम्युनिस्ट' गुलामी कायम करना भी नहीं हो सकता. ...मोहन दा , हमारे लिए यह बहस इसी लिए अधिक मौजूं है कि अतीत की कम्युनिस्ट सत्ताओं ने ' बुर्जुआ आज़ादी '' को खारिज करने की बात का आज़ादी के ख़याल को ही ख़ारिज के बहाने की तरह इस्तेमाल किया , इस से कम्युनिस्ट आंदोलन को जो चोट पहुँची , उस से उबरना जरूरी है . ... बेशक मुकम्मल आज़ादी मुकम्मल मनमानी का दूसरा नाम नहीं है , लेकिन आज़ादी अगर मुकम्मल नहीं है , तो फिर क्या आज़ादी है !






शमशाद इलाही शम्स बहुत शानदार बहस हुई है..अशोक भाई ने जो सवाल और शंकायें व्यक्त की हैं वह भारतीय परिस्थितियों में अपना विशेष महत्व रखती हैं, कई कई सदी वाली चेतनाओं का मिश्रण आपको एक साथ भारत में दिखता हो तब कोई फ़ैसलाकुन बात कहना वाकई गंभीर मसला है...कोई न कोई तबका जरुर उपेक्षित रह जायेगा..लेकिन लेनिन महान के माध्यम से मोहन दा ने जिस संदर्भ को समझाने की कोशिश की है शायद वह भारतीय स्थितियों में और अधिक विस्तार की अपेक्षा रखती है...और आशुतोष जी ने स्वतंत्रता के सवाल पर कम्युनिस्ट शासन के दौरान लेखकों पर हुई ज़्यादतियों की तरफ़ इशारा कर के गंभीरता के नये आयाम दिये हैं. ल्यु ज़्याबो को अभी चीन में १० साल का कारावास दिया गया है और इस सवाल पर मैंने कोई पत्ता हिलता नहीं देखा..मसला गंभीर है, नियम चयन के आधार पर नहीं बनने चाहिये...सुखारोव को जब जेल में डाला गया था, तब अपने छात्र जीवन में हमने सी.पी.एस.यू. की लाईन को फ़ोलो किया था जिसका अभी अफ़सोस होता है. स्वतंत्रता कभी पूर्ण हो ही नही सकती..उसे किन्ही नियमों और जिम्मेदारियों के बंधन में होना ही होगा..अन्यथा उसे स्वछंद्ता ही नाम दिया गया होता. और तबकाई समाज में आज़ादी के मायने ही बदल जाते हैं...मुल्लाह की अलग, पंडत की अलग, थानेदार की अलग और गांव के मुखिया की अलग....फ़ैक्ट्री में दिगर तो अखबार में कुछ और.






अशोक कुमार पाण्डेय असल में मेरा स्पष्ट मानना है कि युद्धोत्तर और असामान्य परिस्थितियों में क्रान्ति के बाद के रूस और चीन में शासन चलाने और प्रतिक्रान्तिकारियों की कारवाइयों को रोकने के लिए जो बाते कहीं /करीं गयीं उन्हें जब बाद में सामान्य परिस्थितियों में जड़सूत्रवादी तरीके से लागू किया गया तो वे एक निर्मम तानाशाही की शक्ल में सामने आईं. उनके पवित्र हथियार का प्रयोग जनता की जेनुइन आवाज़ को दबाने और लोकतांत्रीकरण तथा विकेन्द्रीकरण द्वारा सर्वहारा के बड़े समूह को सत्ता की निर्णय-प्रक्रिया में शामिल होने से रोकने के लिए किया गया जिसने क्रान्ति के वृहत्तर उद्देश्यों को क्षति पहुँचाई. अब हमें इन्हें पवित्र वेद मंत्रो की तरह दुहराने की जगह अपनी काल-परिस्थितियों तथा युद्धोत्तर कालीन योरप व् एशिया की तुलना में कहीं बहुत अधिक लोकतांत्रिक समाजों में जनता की चेतना के अनुरूप पुनर्व्याख्यायित करने का काम शुरू करना चाहिए. तभी हम भविष्य के लिए बुर्जुआ लोकतंत्र की तुलना में एक अधिक लोकतांत्रिक तथा जन-समावेशी व्यवस्था का स्वप्न निर्मित कर सकेंगे. मैं आज इस पर विस्तार से लिखना चाहता था...लेकिन जन्मदिन की स्नेहिल बधाइयों की भीड़ में खो जाने के डर से नहीं लिखा






रामजी तिवारी पूर्ण तो कुछ भी नहीं हो सकता , स्वतंत्रता भी नहीं ....राजनीति विज्ञानं में यह बहस काफी हुयी है ...वर्तमान लोकतंत्र की अवधारणा इसी स्वतंत्रता की बुनियाद पर है , जबकि समाजवादी व्यवस्थाए स्वतंत्रता से अधिक समानता और न्याय पर जोर देती रही हैं....बुर्जुवा लोकतंत्र में स्वतंत्रता इसलिए प्यारी होती है कि उसकी आड़ में यथास्थिति को बनाये रखा जाय , और समाज में शीर्ष लोगो के हासिल अधिकारों को वैधता प्रदान की जाए...और इस व्यवस्था में जहाँ नियंत्रण लगाया जाता है , वे ऐसी जगहें होती हैं , जिनसे उस यथास्थिति को चुनौती मिलती है | समाजवादी व्यवस्थाए समानता और न्याय की दुहाई देती है लेकिन स्वतंत्रता जैसा महत्वपूर्ण मूल्य हाशिए पर चला जाता है |कहना न होगा कि पिछली सदी के इतिहास में ऐसे उदहारण भरे पड़े है |.






मोहन श्रोत्रिय ‎"काम्य न होना, नाग़वार होना, कम्युनिस्ट गुलामी, कबीलाई गुलामी" आदि जो जुमले हैं, आशुतोष, ये सब न तो मेरी मूल प्रतिक्रिया में और न लेनिन की इस उक्ति में स्वावाभिक रूप से निहित हैं. ये जुमले "क्रांतिकारी" लगते हुए भी, इस उक्ति से स्वावाभिक रूप से निकाले जाने वाले निष्कर्ष भी नहीं हैं. एक ऐसा समाज जिसका सामंती ढांचा अभी पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ है, कितनी हे तरह से "मुक़म्मल" आज़ादी का हनन करता है : खापों के फ़ैसलों, मज़हबी फ़तवों आदि का सिर्फ़ स्मरण करना तस्वीर को पूरी करने की दिशा में एक क़दम होगा. पूंजीवाद के पूरी तरह विकसित हुए बिना, एक उच्चतर अवस्था में पहुंच जाने से "दी जारही दिखती स्वतंत्रता" किस तरह एक विकृत एवं कंडीशंड चेतना के पल्लवित रूप में लेखन, मीडिया और फ़िल्मों में व्यक्त होती है इसका एक उदाहरण स्त्री द्वारा "देह-धन" को आज़ादी के प्रतिबिंबन के रूप में व्यक्त और स्थापित किए जाने का प्रयत्न और व्यवस्था द्वारा उसे प्रदान कि जारही वैधता पर ध्यान दें तो लेनिन की उक्ति क़रीब सौ साल पुरानी होने के बावजूद प्रासंगिक बन जाती है. पूंजीवादी सत्ता एक भ्रामक आज़ादी को वास्तविक बनाकर पेश करती है, और उसकी अनुमति भी प्रदान करती है. लेनिन की उक्ति को लेखक की आज़ादी के निषेध के रूप में नहीं, बल्कि जनता के व्यापक हिस्सों की बुनियादी आज़ादियों के हनन से जोड़े जाने की ज़रूरत के रूप में देखे जाने के रेखांकन को समझे बगैर यदि सिर्फ़ लेखक की आज़ादी के सवाल की तरह समझी जाएगी तो वह "लेखक" को एक "कृत्रिम विशिष्टता की आभा से मंडित करने की क़वायद" से अधिक कुछ नहीं होगी. आपने अपने स्टेटस में जब यह कहा कि भावनाएं तो सबकी आहत हो सकती हैं, हमारी भी, तो आप सही ही यह इशारा ही तो कर रहे थे कि कुछ लोगों/समूहों की भावनाओं को तरजीह दी जाती है, कुछेक दूसरों की नहीं. वर्ग समाज में लेखकीय दायित्वों अन्यत्र की गई लेनिन की टिप्पणियों की अनदेखी हम जैसे लोगों को तो नहीं ही करनी चाहिए, और मात्र एक संक्षिप्त टिप्पणी में वह सब नहीं खोजना चाहिए जो वहां नहीं है. अशोक को "बैन-विरोध" के ह्क़ के सुरक्षित रहते ही यह टिप्पणी सैद्धांतिक रूप से सही लगती है, और आप इस में कई तरह की "गुलामियों के बीज" यहां देखते हैं. जिसका ज़िक्र तक न हो वह नाग़वार गुजरने लगे तो फ़ैज़ याद आते हैं. फ़िलवक्त सिर्फ़ इतना कि कम से कम लेनिन पर लेखक को तरह-तरह की गुलामियों में धकेलने की तोहमत तो उनके घनघोर आलोचकों ने भी नहीं लगाईं,लेनिन के काल-क्रम को न भूलें, मित्र लोग ! और लेनिन को स्टालिन से गड्डमड्ड भी न करें. एक मूलतः दार्शनिक-सैद्धांतिक बहस के पटरी से उतर जाने की आशंका को भी ध्यान में रखने से, और विचारधारा की मूल सरणी से जुड़े रहकर बात को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है.






अशोक कुमार पाण्डेयखाप पंचायतों के एक केस का अगर ज़िक्र करूँ तो वह व्यक्ति की चुनाव करने की स्वतंत्रता बनाम समूह की चयन की स्वतंत्रता का मामला है. इन दोनों में से हम व्यक्ति की स्वतंत्रता को ही वरीयता देंगे. तो उसमें हमारा स्टैंड 'व्यक्ति' की स्वतंत्रता पर ही है. सवाल लेखक की विशिष्टता का नहीं. एक समाज में लेखक तमाम दूसरे लोगों की ही तरह अपना मत रखता है. उसे इस मत की अभिव्यक्ति का हक क्यूँ नहीं होना चाहिए...तब भी जब वह व्यवस्था के खिलाफ कह रहा हो? क्या सिर्फ उसे साइबेरिया भेज कर ही क्रान्ति को बचाया जा सकता है?...इतिहास गवाह है कि बचाया तो तब भी नहीं जा सका. जनता के सही-गलत के निर्णय लेने की क्षमता पर इतना अविश्वास क्यूँ? क्या यही तर्क उन धर्मान्ध और धर्म भीरु सत्ता व्यवस्थाओं के नहीं? एक पूंजीवादी देश में लिख रहे सैकड़ों-हजारों वामपंथियों को लिखने की छूट मिले और एक 'क्रांतिकारी' देश में शासन के खिलाफ लिखने वाले को जेल, तो मैं उस 'क्रांतिकारिता' को अवश्य प्रश्नांकित करना चाहूँगा. मजेदार बात यह है कि आप (यानि वाम लेखक) एक बुर्जुआ व्यवस्था में अपने लिए तो पूरा अभिव्यक्ति का अधिकार चाहते हैं, लेकिन अपना शासन आ जाने पर अपने खिलाफ लिखने वालों की अभिव्यक्ति की आजादी उन्हें गलत लगती है! पूर्ण आजादी जैसी बात न होने का मतलब मेरे लिए बस यही है कि आपको गाँधी को गाली देने का अधिकार नहीं पर आलोचना का पूरा अधिकार है...यही लेनिन या किसी और के लिए भी सच होगा


और जब मैं विश्व युद्धोत्तर काल की बात कर रहा हूँ तो काल क्रम की लाक्षणिक अवस्था बिल्कुल स्पष्ट कर रहा हूँ.






मोहन श्रोत्रिय लेनिन के इस "पाठ" से आगे के कार्यभार तय करना एक बात है, संदर्भ विशेष का अतिक्रमण करके "more Marxist than Marx" (ये मार्क्स के ही शब्द हैं) बिल्कुल अलग चीज़ है. और इस लिहाज़ से बेहतर यह होगा कि अपने "मुक्त" चिंतन के आधार पर कार्य योजना बनाओ, क्योंकि ये स्फुट टीपें उसका हिस्सा भी बन पाएंगी, इसमें मुझे शक है. हम उस पर ही बहस करेंगे. दोहरी शक्ति व्यय करने से क्या लाभ.मार्क्स के परे जाकर भी वह विचार हो तो कोई हर्ज नहीं है.






आशुतोष कुमार लेनिन पर तोहमत कौन लगा रहा है , मोहन दा . मैंने पहले ही कहा कि चूंकि इन का कोट यहाँ अपने पूरे सन्दर्भ के साथ नहीं है , इस लिए खास उस पर बात करना सुविधाजनक नहीं है ....अभी क्लास के लिए निकलना है , इस लिए शाम को लौट कर बात को आगे बढाने की कोशिश करूँगा ....क्लास छोड़ कर विमर्श का रस लेने की 'आज़ादी' तो हम में से किसी को काम्य नहीं है .आजादी का अगर यह मतलब भी हो सकता हो , तो हम उस की बात नहीं कर रहे हैं






आज मेरा भारत अपनी ही दुर्दशा पर रो रहा है !

आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा 
पर रो रहा है ,

हर तरफ अत्याचार, 
फ़ैल रहा भृष्टाचार,
रो रही मानवता ,
 हो रहा दुराचार 
 देख कर निज सुतो का 
निज पर व्यभिचार !
विवश हो रहा है ! 
आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा
पर रो रहा है !

हाय मानव की पिपासा,
जागृत क्षुधा
अभिशिप्त अभिलाषा ,
यह कलुषित समाज,
हो रहा कैसा  द्वंद्व आज !
सुभाष ,भगत आजाद,
कैसे होगा सहन यह
निज बांधवों का अवसाद !
अमित अस्तित्व क्यों
आज खो रहा है ?

आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा
पर रो रहा है !

गीता का दर्शन ;
पन्ना का त्याग,
हल्दी घाटी का मैदान,
जलियाँ वाला बाग़ !
राणा की धरती ,
पदमनियों का सुहाग !
आज क्रांति की हर
वो सर्जक आग ,
सब यह व्यर्थ
क्यों हो रहा है?

आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा
पर रो रहा है !


शनिवार, 21 जनवरी 2012

नसीब

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!

खुद को बहुत सम्भाला मैनें ,
न जाने क्यों मैं संभल न  पाया?
हर कोशिश नाकाम हो गयी;
कोई भी मुझको समझ न पाया!
दिया होता लबों ने साथ मेरा,
ये जलवे मेरे नसीब में होते ;

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!

करता हूँ कोशिशें भुलाने की ,
हर कोशिश पे याद आ जाते हो!
आंसू बन कर तुम आँखों में,
हर तन्हाई के बाद आ जाते हो 
होते न ये आंसू और तन्हाई 
जो तुम मेरे करीब में होते 

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!

मैं हूँ, तो किसलिए जिन्दा अब;
किस खता की ये सजा पा रहा हूँ ;
न तो कोई जीने का सहारा है,
किस उम्मीद पे जिए जा जा रहा हूँ ?
हर लम्हा मुस्कुरा के जी लेता 
जो तेरे गम मेरे नसीब में होते!

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!




'भारत -महान !

टूटी खाट पर
टूटे हुए बदन में 
आहें भरता हुआ,
ये तुम्हारा 'भारत -महान !

जिसके हर एक 
हिस्से का टार्चर 
करते हुए तथा कथित 
नेता - कर्णधार !

ब्यभिचार और
 व्यापार में जिनका
 कोई सानी नहीं!

वोटों के लिए 
बेच देते हैं सरकार को ;
और महंगाई की मार से 
देश को कर देते लाचार !

मंदिर के चढ़ावे का 
देकर ठेका ,भगवान को 
भी कर देते नीलाम !
साथ में देश की 
अडिग श्रृद्धा भी हो 
जाती कंगाल !

और देश के आधार रुपी 
ढांचे को अपने दलालों के 
हांथों में देकर ,नहीं छोड़ते 
बैसाखी लायक !  


बेचारा भारत का किसान!

जीवन भर तरसते हुए ,
लोगों का पेट भरता रहा!
कभी गाली, कभी उलाहना
खामोश रह कर  सहता रहा !

सारे जहाँ का गम
अपना समझा ,
पर यहाँ निकम्मा ही
 कहलाता रहा
गर्मी का तपता सूरज हो
 या हो  दिसम्बर का
 कपकपाता जाड़ा,
न मौसम का गिला दिया
अपना फर्ज समझ कर कर्ज
 निभाता रहा !

रुका न कभी साँस रुकने तक
पेट के लिए धरती की छाती को
चीरकर , अन्न उगाता रहा !
खाने को भोजन  और
पीने के पानी हेतु
हमेशा लड़ता रहा !
और
क्या मिला ये बताकर मैं
खुद को क्यों
जिन्दा जलाता रहा !


गुरुवार, 19 जनवरी 2012

कुछ लावारिश बच्चे !

साँझ के झुरमुट से
झांकता एक 
नन्हा पक्षी 
जिसे प्रतीक्षा है
अपनी  माँ की !
सुबह से गयी थी 
जो कुछ दानों की 
खोज में !
दिनभर भटकने के बाद 
तब कहीं जाकर 
अनाज की मंडी में 
मिले थे  चार दाने 
घुने हुए गेंहूं के !

चोंच में दबाये 
सोंच रही है ,
इन चार दानों से 
तीन जीवों का 
छोटा पेट भर पायेगा 
या कि रात कटेगी 
चाँद को  ताकते हुए! 

तभी उसे नजर आया 
उसका अपना घर और 
वह  चूजा जिसे छोड़ कर
निकली थी भोजन की
तलाश में !

क्या कहेगी अपनों से 
बस दिन भर में मिले 
केवल यही चार दाने !

फिर याद आया
उसे मंदिर के कोने में 
बैठा हुआ एक अपाहिज 
और उसका सूना 
कटोरा!
और
कूड़े के ढेर पर पड़ी हुयी 
रोटियों के लिए 
लड़ते हुए 
कुछ लावारिश बच्चे !

तसल्ली देकर 
खुद से बोली 
कमसे कम मेरा चूजा 
लावारिश और 
अपाहिज तो 
नहीं है 
आज एक दाना 
ही खाकर 
चैन  से सो तो सकेगा  !

 

बुधवार, 18 जनवरी 2012

अदना सा विश्वास !

अँधेरे में भी चाहते हो ,
साथ दे तुम्हारा साया 
जब स्वयं  का  अस्तित्व   
नही जान पाए 
साया तो एक भ्रम है !

जब तुम्हारा  स्वयं  का 
विश्वास   तुम्हे ही 
नहीं स्वीकार कर पा 
रहा है !
किसी अन्य का अस्तित्व 
तुम्हे कैसे सह्य होगा !

परन्तु 
आशाओं के समक्ष
यह अदना सा विश्वास !
वायु के हल्के से झोंके में 
डिगने लगता है !


सोमवार, 16 जनवरी 2012

प्रश्न ?

कि आज पुन: ,
जीवन को न्यायालय में
अपराधों और आरोपों के
समक्ष स्वयं को प्रस्तुत
करना पड़ा!

यही जीवन जो कभी
धन्य हुआ था गीता के
कर्म पथ पर प्रेरित
करने वाले दर्शन से;

यही जीवन जो कभी
वेदों की ऋचाओं के पावन
स्पर्श से हुआ था अमर ,

क्यों रे कलुषित
और कलंकित ,
अनन्त काल के
व्यथित पथिक;
किस दंड से होगा
तेरा चिर त्राण !

क्षण -प्रति क्षण
होकर भ्रमित , भटक रहा
व्योमोहित ,
क्यों कर रहा
व्यर्थ अप्राप्य श्राम?

ढोकर इन नीरस प्राणों को,
किस गंतव्य की खोज में
गतिमान है तेरा पंच हय
यह नश्वर स्यन्दन !

पर क्या उत्तर देता
ये जीवन ,
अनुत्तरित ही गतिज बना
अनन्त की ओर!
 

  

रविवार, 15 जनवरी 2012

'संसय,

पुष्पों का चिर रुदन ,
जीवों का यह कृन्दन ,
अब और तुषारापात!
सह कर रहा नहीं जाता !

सूरज भी व्याकुल है ;
उसका भी मन आकुल है,
ह्रदय पर यह आघात ,
चुप रह सहा नहीं जाता !

कुहासे की यह क्रीड़ा,
देखकर अत्न की पीड़ा ;
निज पर निज का संघात!
कुछ और कहा नहीं जाता

जीवन में यह कैसा संसय ,
देख कर हो रहा विस्मय ;
चल रहा कैसा चक्रवात ;
अब और चुप रहा नहीं जाता !

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

'Remains’


The momentum which I Passed,
And you treasured in memories;
How could you lost ’hem now,
Oft I think and recall …………!
Still I get petrified ‘Remains’.





When I saw your visage in my heart
I felt luminous flame of glaring part,
You still alive in these passed recalls.
Always your chanting hymns come falls



I was sure about your painting
But never not so soon,
Night has been passing since;
Waiting still gloaming moon.!!

अंत हीन निशा !

बीते बरस ऐसे ,
मानो कल की बात हो !
रीता जीवन जैसे
अमावस की रात हो !

दिन भर बाद ,
उन शामों का ढलना,
दिल में अधूरी
आशाओं का मचलना,
सोंच कर मन में
 बिछलन  की बातें ;
सांसों का रुक जाना,
दिल का दहलना !

उनका मेरे जीवन से जाना ;
जैसे कोई अधूरी बात हो!

रीता जीवन जैसे
अमावस की रात हो !

कुछ कहना और कुछ सुनना,
मन ही मन कुछ -कुछ बुनना,
चुनना सपने, सपने गुनना !
सपने- अपने सब भूल गये;
रह गया बस सांसों का चलना!

कहाँ खो गयी ऊषा की आशा;
जैसे अब ये अंत हीन रात हो !
रीता जीवन जैसे
अमावस की रात हो !



गुरुवार, 12 जनवरी 2012

A Heart;

Alas!
It's called A Heart;
Which gives us all,
That need for life;


But!
It seems, is useless
Fails to feed in need!
Gives only grieves and pains;


Perhaps!
Our nutritions are not so;
And not as needed for it,


So,
It gets confused in task;
neither fails nor pass;
We want pure and perfect,
Where's it come as perfection !

आह्वान !



तोड़ दो सपनों की दीवारें 
मत रोको सृजन के चरण को!
फैला दो विश्व के वितान पर;
मत टोको वर्जन के वरण को !

कितनीं आयेंगी मग में बाधाएँ ,
बाधाओं का कहीं तो अंत होगा ही 
कौन सका है रोक राह प्रगति की ;
प्रात रश्मियों के स्वागत का यत्न होगा ही!

नीड़ से निकले नभचर को 
अभय अम्बर में उड़ने दो!
प्रलय के विलय से न हो भीत,
तृण - तृण  को सृजन से जुड़ने दो !
जला कर ज्योति पुंजों को 
हटा दो तम के आवरण को !
तोड़ दो सपनों की दीवारें 
मत रोको सृजन के चरण को!

कंचन कामिनी और कीर्ति का 
जग हेतु तुम परित्याग कर दो ;
फूंक प्राण चेतना के उर में,
नव सृजन का अनुराग भर दो!

कुंठित कुंठाओं का क्लेश हार ,
नव आश का सनचार कर दो!
मिटाकर दानवता इस जग से ;
मानवता का शृंगार कर दो !

विस्मृत कर निज वेदना को ;
रोक लो तुम निर्मम प्रहरण को !
तोड़ दो सपनों की दीवारें 
मत रोको सृजन के चरण को!

बुधवार, 11 जनवरी 2012

अभिलाषा !!


सागर तट की
वह ऊष्ण रेत,
जिसकी आद्रता
क्षणिक थी,

जीवन के वो पल
जो गुजरे थे,
कभी उस रेत पर ,

रेत तब से
अब तक वैसी ही है;
पर वे क्षण ,
अभी भी आँखों को
गीला कर जाते हैं!

आज मैं
भटकता हुआ
पहुँच गया
उसी रेत की
तलाश में

वे कुछ कण
जो बदन से
 लिपटने के बाद
फिर बिछुड़ गए,
वहीँ कहीं पर!

शायद
कहीं कोई रेत
का कण आज भी
उन क्षणों की
प्रतीक्षा में !
ठहरे थे ,

पर अभागा
वह और मैं
आज भी
कर रहे हैं
फिर से वाही
अभिलाषा !!

शनिवार, 7 जनवरी 2012

'आत्म हत्या'

सुबह-सुबह ही
एक घर के सामने,
पुलिस का वहां खड़ा था ;
एक दरोगा दो कनेस्टेबेल
लाश के पंचनामे के
पचड़े में उलझे हुए---

चित्रकार चित्र उतार रहा था,
लाश के हर दिशा से, हर कोण से
मात्र गले के ही
तीन चित्र उतारे गये;

फिर पूंछ ताछ हुयी;-
मृतिका का नाम- कुसुम (जिसे खिलने ही न दिया गया )
उम्र - बीस साल ,
पति का नाम- दयाल;
स्वसुर का नाम- अमीरचंद ,
ब्याह कब हुआ था -एक वर्ष पहले!


तो मामला संगीन है;
अपराध भी तो कम नहीं है;
लाश पोस्त्मर्तम को जायेगी,
कार्यवाही तभी होगी
जब वहां से रिपोर्ट आयेगी ;

शाम को बाप बेटे दोनों -
पहुंचे एस पी के पास ,
मन प्रसन्न, चेहरा उदास;
मंत्री का पत्र साथ था,
एस पी से सीधे
मिलने का पास था!

बात पचास हजार में तय हुयी,
कुछ दिन पश्चात
रिपोर्ट भी आ गयी ,
कुछ ऐसी थी जो
अदालत को भी भा गयी!

यह 'दहेज़ उत्पीडन' की घटना,
न होकर 'आत्महत्या' करार दी गयी ;
एक पत्र पर बहू के हश्ताक्षर जो थे;
उसी की हत्या के साक्ष्य जो थे,

लिखा था-
मेरे पिता ने मुझे बलात
यहाँ ब्याहा था ,
जो की मेरे लिए अनचाहा था ,
मेरा अंतरजातीय प्रेम,
प्रेम न होकर
एक मात्र अभिशाप था!
मेरे उदर में
उस बदनसीब
का पाप था
अब आत्महत्या ही
उसका अंतिम पश्चाताप था!

मामले को कुछ ने समझा
कुछ को समझाया गया
सत्य-असत्य का
रहस्य-रहस्य ही रह गया ;
दहेज़ उत्पीडन को अब
आत्म हत्या ठहराया गया !

जिन्दगी है एक धूप छाँव सी;

जिन्दगी है एक धूप छाँव सी;
पल-पल बदले शहर गाँव सी!

कभी मिल जाते मीठे पल,
कभी याद आते बीते कल;
 हसती, रुलाती, गुदगुदाती;
कभी दुखती है जिन्दी घाव सी;
जिन्दगी है एक धूप छाँव सी;

कभी अपने भी पराये हो जाते,
कभी पराये भी अपने हो जाते!
जश्न मानती है जिन्दगी कभी;
तो कभी डगमगाती है नाव सी;
जिन्दगी है एक धूप छाँव सी;

अनजानी राहों से है गुजरती ;
तो कभी ठहराव लाती जिन्दगी!
जिन्दगी के हैं कई रंग-रूप:
है ये जिन्दगी एक बहाव सी ;
जिन्दगी है एक धूप छाँव सी;

कभी सुबह की लाली है तो
कभी लगती है  उदास शाम सी;
चलते-चलते चली जाती है;
यह  तो बस है एक पड़ाव सी,

जिन्दगी है एक धूप छाँव सी;
पल-पल बदले शहर गाँव सी!

अपवृत्त

किस व्यथा से है व्यथित
किस हेतु कर रहा पश्चाताप
मिथ्या से होकर भ्रमित,
क्यों कर हो रहा तीव्र संताप!


निज को तू कब पहचानेगा
किस भ्रम से है अब भ्रमित ;
पूर्ण का अपूर्ण अंश है तू
व्यर्थ स्व को कर रहा श्रमित!


तज निज की अब यह तन्द्रा
स्वप्न मरीचिका से हो जागृत;
नश्वर है जो नहीं शास्वत ,
सर्व से ही है आगत-विगत !


अपूर्ण को कर दे पूर्ण,
वह पुन्य पथ है निर्वाण का;
अन्य पथ सभी भ्रम के;
करेंगे बाधित लक्ष्य त्राण का!


यह है तृष्णा की तपिश जो,
तू पुकारे हा तृष्णा, हा तृष्णा ;
होकर भ्रमित कृतिका से,
कर रहा तू ये जीवन मृष्णा!


फल की लिप्सा में तू क्यों कर,
कर्मच्युत हो रहा जीवन में !
जीवन तो है क्षणिक पर,अब
लक्ष्य चिंतन कर मन में !

अपनी ही दास्ताँ

 कोई भूल जाता है
अपनों को 
कोई अपना लेता है 
सपनो को ,

किसी को दर्द में
मिलती  ख़ुशी, 
कोई  ढूढ़ रहा 
ग़मों में हंसी ,

कोई रो रहा है 
अपने ही हाल पे ;
नाच रहा कोई
दूसरे की ताल पे,

सब अपनी ही 
कहानी बुने जा रहें ,
अपनी ही दास्ताँ 
खुद ही सुने जा रहें !

दस्तूर है इस जहाँ का 
किसी का कोई 
सहारा नहीं होता;

डूबती कश्ती का और 
आती -जाती मौजों  का 
किनारा नहीं होता !

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

तृषा का सागर न दो,

अतृप्त  मन की 
अधूरी प्यास को 
तृषा का सागर न दो,

दो मीठे शब्दों के 
भूखे को ,स्वर्ण 
भरा गागर न दो;

जीवन की प्यास
 नही जिसे, उसको  
अमरत्व का वर न दो !

लक्ष्य भटक जाय 
पान्थ का , पग 
उस पथ पर न दो !

टूट चुका कष्टों से;
अब ये दु:ख उसे 
जीवन भर न दो !

कविता और कहानी के आधुनिक कलेवर पर लोगों की राय !


मोहन श्रोत्रिय 
यह देखने पर "ज़ोर" कम क्यों हो गया है, इन दिनों, कि कहानी में कितना "कहानीपन" बचा है? और 
कविता में कितनी "कविताई"? और इन दोनों में बोलना 
हमारे समय का? कहीं यह उत्तर-आधुनिकता का असर/लक्षण ही तो नहीं कि कविता-कहानी में मूल 
अंतर्वस्तु के सिवाय बहुत कुछ दिख जाता है? कि समय 
शिल्प में बोलता है या कथ्य में? कि शिल्प यदि अलग से बोलता है रचना में, तो वह रचना की ताक़त हो 
सकता है क्या


इस अनुच्छेद पर हुयी चर्चा के अंश :


प्रेम चंद गाँधी : सर, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। इधर शिल् पर कुछ ज्यादा ही जोर है और सच में 
यह हमारे समय की उत्तर आधुनिक ट्रेजेडी है। यह 
अलग किस् का रूपवादी समय है, जहां अंतर्वस्तु के बजाय शिल् को पसंद ही नहीं किया जा रहा, बल्कि 
उसे ही मुख् माना-कहा जा रहा है।


धीरेश सैनी : पिछले कुछ बरसों में कुछ अजूबा करने का कंपीटिशन सा रहा। ठानकर लंबी कविताएं-
कहानियां औऱ उनके अजब-गजब शिल्प पर वाहवाही 
की गई लेकिन उनके कथ्य पर जो कई बार बेहद पुनरुत्थानवादी, ब्राह्मणवादी और वंचित समाज विरोधी 
रहा की अनदेखी की गई। बर्र के छत्ते में हाथ डालने के 
डर से अधिकांश लोग चुप रहे, कुछ को बोलने पर गालियां खानी पड़ीं। `अभिव्यक्ति की आज़ादी`जहां 
लेखक पूरी तरह बरी है।


मोहन श्रोत्रिय: चिंता की बात लगी, प्रेम चंद, इसीलिए साझा की. मंशा भी यही रही कि मित्रों की राय आए और कोई व्यापक सहमति बन सके.

प्रेम चंद गाँधी : सर, यहां मैं पहली बार आपको अपनी यही चिंता जो मैंने लंबी कविता 'भाषा का भूगोल' में व्यक् की है, बताना चाहता हूं। ''हर तरफ 

आकृतियां थीं अर्थहीन/अमूर्तन की अनसुलझी पहेलियां थीं/प्रयोगों की भरमार थी ऐसी कि/समाज में जो घट रहा था/उसका अंश तक नहीं था कला में''


धीरेन्द्र अस्थाना : साहित्य की शिल्प रचनात्मकता और कथ्य दोनों ही आज के उत्तर आधुनिकता में उपेक्षित हो रहें हैं , साहित्य कार अपने दायित्त्व से पीछे 
हटते जा रहें हैं , हाँ नवीन प्रयोग होने चाहिए पर नवीनता ग्राह्य और सार्थक हो !साहित्य जब यथार्थ की पृष्ठ भूमि पर लिखा जाय तो शिल्प और कथ्य दोनों 
स्वाभाविक रूप से मिलता है !
मुंशी प्रेम चंद, ताल्स्तॉय, चार्ल्स डिकेन, और वर्ड्सवर्थ महादेवी वर्मा आदि इनके अनगिनत उदहारण हैं !


रितुपर्ना मुद्रा राक्षस : पूर्ण सहमति! बहुत ज़्यादा नहीं जानती हूँ लेकिन मेरा मानना है कि किसी भी रचना का कथ्य-विषय अपने अनुरूप शिल्प का चयन 
स्वयँ करता है... बेवजह शिल्प का जानाबूझा (deliberated) इस्तेमाल रचना को कमजोर ही करता है..

मोहन श्रोत्रिय: तुम्हारी वह कविता अच्छी लगी थी, प्रेम चंद. बस उसका एकाध हिस्सा ऐसा लगा था जैसे जल्दबाज़ी में लिख दिया गया हो, और जो पूरी 
कविता की "टोन" से मेल नहीं खा रहा था. वह कविता तो थी ही, अपने समय की रचनाशीलता की समीक्षा भी.

आकांक्षा  अनन्त  सिंह  मैं समझती हूँ कि लेखन के शास्त्रीय परंपरा से कटा हुआ उत्तर आधुनिक रचनाकार कथ्य शिल्प में संतुलन की स्थापना में खुद 
को अक्षम पा रहे हैं ..... हाल के वर्षों में अनुवादित कविताओं/कहानियों की भरमार ने भी शिल्प के दिशा निर्धारण में एक अलग प्रकार की अराजकता को 
लेखन में प्रतिष्ठित कराया है.. अनुवाद में प्रकट होने वाली कमजोरियों को नए रचनाकारों ने नए प्रकार का शिल्प समझ लिया है ..'मेरी नाक' को 'मेरे होठों के 
ऊपर का उभार' लिखने की परिपाटी जोर पकड़ रही है और इसे सराहा भी जा रहा है..

धीरेन्द्र अस्थाना :किसी भी समय का साहित्य उस समय के समाज का बिम्ब या इतिहास दर्शाता है ,
पर अद्यतन साहित्य भविष्य के समाज को क्या देगा ये तो अभी काल के गर्भ में हैं !
हाँ यह तय है कि इस काल का साहित्य अपनी दिशा और लक्ष्य से भटकाव की ओरजा रहा है !

माधवी पाण्डेय : आप सभी लेखन के क्षेत्र में प्रतिष्ठित व्यक्तित्यों के बीच अपनी अदना सी समझ रख रही हूँ - कविता या कहानी में शिल्प को निभाने के अतिवादी प्रयास में भाव और कथ्य कंही खो जाता है ऐसे में कविता  या कहानी का मूल पीछे छुट जाता है और रचना मात्र 
परिष्कृत/दुरूह शब्दों का संग्रह ही रह जाती है . रचनाधर्मिता के क्षेत्र में नया इतिहास लिखने की होड़ में ही कोई भी रचना अपने समय के यथार्थ से दूर होती जा रही है .


दिगम्बर आशु :सवाल यह है की कथ्य की उपेक्षा कर के शिल्प की कलाबाजियों का ( नाक बेंच कर नथनी खरीदने का ) यह फैशन क्यों बढा? इस के पीछे विचारधारा से, जनोंन्मुखता से, प्रतिवद्धता से, पक्षधरता से पल्ला झाड़ने की घोषित-अघोषित प्रवृति की बड़ी भूमिका रही है.प्रयोगवादी दौर में भी यह रुझान इतने घातक रूप में मौजूद नहीं था.तभी तो शप्तक कवियों के बीच से प्रबल जनपक्षधर कवियों की धारा बह चली थी.

धीरेन्द्र अस्थाना : जब बच्चे को भूख लगती है तो वह माँ से सरल रूप में ही भोजन मांगता है ;
इसी तरह सीधी बात में व्यक्त किया गया साहित्य भी जन मन और समाज को अपना औचित्य बताता है कि मष्तिष्क को उलझाने वाला शब्दाडम्बर से भरा हुआ
क्लिष्ट साहित्य ! तुलसी बाबा की विनयपत्रिका और श्री रामचरित्र मानस इन दोनों विधाओं के सक्षम उदहारण हैं !

अरुण देव : कवि और कातिब में फर्क तो करना होगा..

वंदना शुक्ल : दरअसल लिखना हर कवि के लिए एक आत्म संघर्ष होता है ,|जो रचनाएँ मात्र लेखक का अपना मंतव्य होती हैं इकतरफा ,और अपने पाठक को नज़र अंदाज़ करके लिखी गई हैं ,वो सफल नहीं होतीं |कहानी में एक्टीविज्म होना चाहिए |कहानी हो या कविता ,जीवन के साद्र्श्य और समय के सापेक्ष होनी चाहिए |निर्मल वर्मा के लिए कहा गया ‘’समय उनके यहाँ कभी बीतता नहीं उपस्थित रहता है’’|यही कालजयी साहित्य है |दरअसल उत्तर आधुनिकता वाद एक त्वरित (इंस्टेंट)समय की पैदाइश है यहाँ भोजन से लेकर ख्यति तक में ये अवधारणा प्रतिबिंबित होती दिखाई देती है येन केन प्रकारेण |हिंदी कविता में प्रयोगधर्मी वातावरण इसी अवधारणा का प्रारूप है |विश्व प्रसिद्द लेखकों में कथ्य शिल्प का संयोजन और सामंजस्य उनकी विशेषता है ,जहाँ शब्दों का वेग कथ्य को अतिक्रमित नहीं कर पाता लिहाजा यहाँ शिल्पगत क्रीडा यथार्थवादी तत्व का असंतुलन नहीं |उत्तराधुनिकता में यथार्थ की अपेक्षा प्रायः चमत्कार 
का अंश और शिल्प अधिक महत्वपूर्ण हैं |आज क्लिष्टता को उत्कृष्टता का पर्याय मान लिया गया है,इस सन्दर्भ में शमशेर के एक लेख की पंक्तियाँ याद आती हैं 
‘’
सरलता का आकाश था जैसे त्रिलोचन की कवितायेँ साधारण अभिव्यक्ति में असाधारण अर्थ खुलते हों ,चेखव की कहानियां इसका सशक्त प्रमाण हैं |कहा गया कि ‘’मानवीय संवेदनाओं को बचाना ही कविता का सबसे बड़ा काम है ‘’|केदार नाथ सिंह की एक कविता ‘’मै बरसों से जानता था /एक अधेड़ किसान /थोडा थका,थोडा झुका हुआ /किसी बोझ से नहीं /सिर्फ धरती के उस गुरुत्वाकर्षण से /जिसे वह इतना प्यार करता था /उसकी छोटी सी दुनियां थी /छोटे सपनों और ठीकरों से भरी हुई /उस दुनियां में पुरखे रहते थे /और वे भी जो अभी पैदा नहीं हुए |ऐसी तमाम कवितायेँ हैं जिनकी दरकार किसी खास बौद्धिक पाठक वर्ग की ना होते हुए भी संवेदनाओं के अधिक सन्निकट हैं ,यही साहित्य का उद्देश्य है और यही प्रासंगिकता | विपिन कुमार की कविता में ‘’कविता ‘’का एक बिम्ब प्रस्तुत किया गया है ‘’अब तो जो हाल है कविता में /ठीक एक जैसे शब्द भी रख दूँ /तो वे आपस में टक्कर मारने लगते हैं /शब्दों के बीच भी /आपसी मेल मिलाप और परस्पर सम्मान या रिश्ता /ना बच सका /कविता का ज़रा लिहाज़ भी नहीं /पास आते ही मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं .....|’’कहानी में यथार्थ के प्रति एक खास किस्म की निषेध वादी द्रष्टि से फंतासियों ,प्रतीकों,संकेतों से भरे असंबद्ध ,निरर्थक ब्योरों से लदी फदी कहानियों को आधार बनाकर युवा रचना शीलता को कहानी के विकास के एक खास आयाम के रूप में देखना एक एतिहासिक भूल होगी ‘’|’’रवीन्द्र कालियाइस सर्द अँधेरी सुबह में तेज़ी से दूर जाती वह चीख मुझे दुनियां छोड़ रही किसी आत्मा की आह जैसी लगी ‘’...मोपांसा
‘’
सूरज की टटकी किरणों सी आभा में लाल ताजा फूलों से लादे जंगल पलाश दाहक उठे ,मानो जंगल में आग लग गई हो ‘’’’’(निर्मल वर्मा )
कहानी में उपरोक्त दो विख्यात कथाकारों के उदाहरण में शिल्प ,यथार्थ को अतिक्रमित ना करते हुए कहानी का मार्ग प्रशस्त करता है |

मोहन श्रोत्रिय: यह 'कातिब' कहां से गया? ऊपर कही किस बात से यह ध्वनि निकली, खुलासा कर दें तो सहूलियत रहे.

धीरेन्द्र अस्थाना: प्रशाद जी द्वारा रचित रचनाएँ वंदनाजी के तर्क कोबल देतीं हैं जोकि शिल्प और कथ्य दोनों पक्षों का निर्वहन सार्थकता से करतीं हैं !

अरुण देव : लेखक की कलात्मक संवेदना से ही उसकी सामाजिक संवेदनशीलता की खोज़ होनी चाहिए. कला के विशिष्ट स्वरूप की पहचान करते हुए उसके सामाजिक अभिप्राय की खोज़ होनी चाहिए !रचना के सिर्फ अंतर्वस्तु की विवेचना अक्सर समाजशास्त्रीयता का शिकार हो जाती है.

मोहन श्रोत्रिय: कविता बिंबों की सामर्थ्य दिखाने के लिए या बिंब कविता को असरदार बनाने के लिए?


अरुण देव : दरअसल यह ग्राम्सी का बड़ा ही मशहूर वाक्य है-"दो लेखक एक ही सामाजिक ऐतहासिक वास्तविकता को अभिव्यक्त करते हैं लेकिन उसमें से एक कलाकार होता है और दूसरा केवल कातिब "बिम्बो में भी असरदार कविता होती है जहां तक उत्तर आधुनिकता का सवाल है ..उत्तर का बड़ा नजदीकी रिश्ता अन्त से है. उत्तर आधुनिक्तावादिओं ने लगभग हर चीज के अन्त की घोषणा कर रखी है ज़ाहिर है कविता की भी. पर अब जहां से वह पैदा हुई है खुद वहाँ भी उसका अन्त हो गया है.

आकांक्षा अनंत सिंह : शिल्प और कथ्य की अपनी अलग अलग शक्ति और सामर्थ्य पर बहस नहीं किया जा सकता..सचमुच केवल बिम्बों में गुंथी एक कविता अद्भुत हो सकती है तो केवल कथ्य में व्यक्त एक जनबासी सर्वोपरि रचना.. मुझे लगता है कि कविता/कहानी को लम्बे समय तक जिंदा बनाये रखने का सवाल रचनाकार की मुख्य चिंता होनी चाहिए.. कालजयी लोकोक्तियाँ इसका उदाहरण मानी जायें जो शब्दों में तो कमतर होती हैं पर कभी शिल्प की वजह से तो कभी कथ्य के सहारे लगातार प्रयोग में बनी रही हैं 

मोहन श्रोत्रिय: पर अरुण जी, मेरी बात का तो उत्तर नहीं मिला. कातिब के सवाल पर. जिन्होंने हर चीज़ का अंत घोषित कर दिया, यहां बात उनकी उतनी नहीं जितनी उनकी कि जो कदाचित उस अंत को वास्तविक मानकर एक नई शुरुआत कर रहे हैं.

अरुण देव : दिन - भर की तपिश के बाद
                 
ताज़ा पिसा हुआ गरम-गरम आटा
                 
एक बूढ़े आदमी के कंधे पर बैठकर
               
लौट रहा है घर............... (केदारनाथ सिंह)
    
बिम्ब है या कविता

मोहन श्रोत्रिय: और खुद वहां ही 'अंत' का अंत हो गया है, तो 'विचार' और 'यथार्थ' के अंत का अंत भी हो ही गया होगा, तब तो स्टेटस में उठाए गए सवालों के उत्तर खोजना और भी ज़रूरी हो जाता है, अरुणजी.

अरुण देव : कथ्य और तथ्य पर ज़ोर कातिब का होता है. कलाकार भाव और शिल्प को पकड़ता है.


आकांक्षा अनंत सिंह : ये मारा निचोड़ अरुण जी ने..... सहमति !!

अरुण देव : बिलकुल नहीं...उत्तर आधुनिकता के शव गृह से परे- विचार जिन्दा है. चेतना और हाँ इतिहास भी..और इतिहास के बदलने की संभावना भी.

अशोक आत्रेय : किसी भी अच्छी रचना में शिल्प को कथ्य से अलग किया ही नहीं जा सकता हे यदि ...अगर अन्दर की बात कहूं तो शिल्प और कथ्य में ''अविनाभाव '' सम्बन्ध होती हैं ...

वंदना शुक्ल : अरुण जी ....एक कविता पलती है अंतर्विरोधों पर /लेकिन उन्हें ढँक नहीं पाती |संभवतः हर विधा इस कालगत उतार चढ़ाव के दौर से गुजरती है पर कुछ शक्तियां (प्रेरणाएँ /जुझारूपन)ऐसी भी होती हैं जो उन्हें मरने नहीं देतीं जिलाए रखती हैं |हिंदी रंगमंच इसका एक उदाहरण माना जा सकता है |अशोक बाजपाई संभवतः इसी समय् परक असमंजसता को स्वीकारते हुए कहते हैं ''यह एक ऐसा समय है जिसमे जीवन को संकुचित करने उसे रोकने और प्रभावित करने के सरे दैत्याकार उपकरण हमें ने विकसित किये हैं ऐसे में जीने की इच्छा का जो आग्रह है ,मै उसका कवि हूँ''कवि की यही जिजीविषा कविता को अंतहीन रखने का सामर्थ्य(हौसला) देती है |

अरुण देव : जहां तक यथार्थ का सवाल है. मार्क्सवादी आलोचना में अक्सर इसे उपन्यास और नाटक के संदर्भ में उठाया गया है. कविता कई बार मनवीय आकंक्षाओं की अभिव्यक्ति भी होती है,अक्सर उसका सौंदर्य भाषिक सृजनशीलता का होता है.इसकी व्याख्या यथार्थवाद के भीतर संभव नहीं है..महान कवि नेरूदा का एक कथन है -" जहां तक यथार्थवाद का सवाल है, मैं कविता में यथार्थवाद को पसन्द नहीं करता. कविता के यथार्थवाद विरोधी होने के हज़ार कारण है "

वंदना शुक्ल : नेरुदा के यथार्थ विरोधी होने का संभावित कारन उनकी वैचारिक प्रष्ठभूमि है |नेरुदा मार्क्सवाद के प्रवक्ता थे ,और उनकी कवितायेँ प्रायः राजनीती से प्रेरित थीं |क्या यथार्थ से इतर भी कोई रचना संभव है?अर्थात मात्र भाषिक सृजन शीलता के आधार पर ?क्या इसे ही अदम जेवेस्की कहते हैं ''एक ऐसा स्फुरण जो लेखक की आत्मा से उठता हो और पाठक की आत्मा में समां जाता हो?हमारे भीतर उस सबके निकट जाने की उत्कंठा हो जिसे शब्दों में बंधा नहीं जा सकता ?''

धनञ्जय सिंह : बहुत सही और जरुरी प्रश्न उठाया है अपने भाई मोहन श्रोत्रिय जी !.......

अशोक कुमार पाण्डेय एंगल्स ने एक कवि के पत्र के उत्तर में इस पर बहुत सटीक टिप्पणी की थी. उसे ढूंढ कर प्रस्तुत करता हूँ. लेकिन उससे पहले यह कि मेरा मानना यह रहा है कि कथ्य अपना शिल्प खुद ढूंढ लेता है. इसका उलटा करने की जो एक सचेत कोशिश पिछले दिनों लगातार दिख रही है उसके पीछे दो ही वजूहात हो सकती हैं - या तो यह कि कहाने के लिए कुछ खास हो ही ना...या यह कि जो कहा जा रहा है उस पर इतना कम विश्वास हो कि उसे पूरी तरह से ढँक-तोप दिया जाय...उलझा दिया जाय... 

मोहन श्रोत्रिय: ‎'कातिब' का यह अर्थ सिर्फ़ आपका है, अरुण. बेशक शब्दों के अर्थ बदलते जा रहे हैं, पर कातिब का अर्थ इतना नहीं बदल गया जितना आप दिखाना चाहते हैं. और अशोक, यह तो सभी मानते रहे हैं कि कथ्य अपना शिल्प खुद ढूंढ लेता है. शिल्प पर अतिरिक्त 'बल' और कथ्य/ अंतर्वस्तु का ऐसा 'घनघोर' नकार काफ़ी नया और चौंकाने वाला है. 'क्या' है जो कविता में व्यक्त होता है, उसे कोई तो नाम दिया ही जाएगा. शिल्प पर अतिरिक्त आग्रह या शिल्प को ही कविता का निर्णायक तत्व मान लेना, बड़ा 'अराजक-सा' प्रस्ताव है. यथार्थ को 'यथा-तथ्य' के अर्थ में लेकर, यथार्थ का खंडन करना तो और भी विचित्र लगता है. हर शब्द का मनमाना अर्थ तो कैसे चल सकता है, वह कातिब हो या यथार्थ या समय का प्रमुख स्वर. मानवीय आकांक्षाएं भी किसी शून्य में जन्म नहीं लेतीं, उनका भी एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य होता है. 

दिवाकर घोष: बहुत कुछ टूट रहा है .फरमे से बाहर रही है कहानी और कविता . 

धीरेन्द्र अस्थाना : सभी से क्षमा मांगते हुए मैं निजी वक्तव्य आप के समक्ष रख रहा हूँ!
शब्द के अर्थ बदलते नहीं बदल जाते हैं अर्थ निकलने वाले ,रही बात कविता में बिम्ब ढूढना या बिम्ब के माध्यम से कथ्य;तो यह भी केदार नाथ जी के बिम्ब से कविता अपना आशय कहने में सक्षम है,समझने वाले इसे कविता का बिम्ब समझें या बिम्बात्मक कविता ,पर यथार्थ तो परिलक्षित है !यदि अलंकारों की आवश्यकता नहीं है तो उनका प्रयोग क्यों होता है?
हर कोई सूरदास जैसा ज्ञानी तो होता नहीं जो आत्मा की आँखों से सौन्दर्य बोध जगाये ! 

नवनीत पाण्डेय : श्रोत्रिय जी सच कहा आपने वर्तमान कहानी में अंतर्वस्तु का स्थान मानसिक अंतर्द्वन्द विकृतियों के कथ्य ने ले लिया है। कहानी कब, कहां,किसकी, क्यों शुरु और खतम हो जाती है पता ही नहीं चलता.. 

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...