शनिवार, 28 अप्रैल 2012

मैं टूटता चला गया!

तुमने मुझे जो तोहफा-ए-गम दिए,
हिफाजत में इनकी , मैं टूटता चला गया!

मंजिले बहुत थीं इस जमाने में मगर
हर एक मंजिल में , तुझे ढूंढता चला गया !

रात में पहले नींद फिर नींद  में ख्वाब  
और  ख्वाबों में तुझको ही  ढूंढता चला गया!

रह गया एक तू ही ख्यालों में अब ,
जहाँ के साथ खुद को ही भूलता चला गया !

आँख को या अश्कों को कहूं बेवफा,
ये सवाल जिन्दगी से पूंछता चला गया !

तुमने मुझे जो तोहफा-ए-गम दिए,
हिफाजत में इनकी , मैं टूटता चला गया! 

रविवार, 22 अप्रैल 2012

रूह लम्हों में बिखरती रही

रूह लम्हों में बिखरती रही
जिश्म रास्ते बदलता रहा !

जिन्दगी ख्वाहिशों में सिमटती रही
दिल अंजामों से दहलता रहा !

सांसों पे पहरा था मौत का ,
वख्त मुश्कों में मचलता रहा !

वहम था जिन्दा है हर कोई,
यह तो सदमें में झुलसता रहा !

शायक और समाज

शायक !
तुमने तो जीने का ढंग,
ढूढ़ लिया शब्दों में !

मगर 
आम आदमी का 
यूं साँस लेना मुनासिब नहीं ;

यही शब्द,
जो तुम्हें जीवन देते हैं;
उसके लिए भ्रम जाल से कम नहीं !

शायद 
यही अंतर है आम आदमी
और  शायक के शब्द अभिव्यक्ति में !

जीवन 
बन जाता है सरल और दुस्तर 
इन्हीं अर्थों की बीथिका में उलझकर !

शब्दों के
अर्थ को पा लेना फिर
उन्हें अंगीकार करना ही सार्थक 
बनाता है शायक का स्पस्ट प्रयोग !

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

स्त्री समर्पण

शायद 
तुम भूल चुके हो,
अपना प्रथम प्रणय निवेदन!

मेरी
पायल की झनक से,
तीव्र हो जाता था स्पंदन !

अब मेरा 
कुछ भी कहना 
लगता है एक कांटे की चुभन !

जानती हूँ,
नहीं तृप्त करता
तुम्हारी सोंच, मेरा यौवन !

अनभिग्य 
भी नहीं हूँ मैं,
चिर परिचित है यह मनु-मन !

बस छोभ
इतना भर है . प्रिये !
क्यों व्यर्थ होता स्त्री समर्पण !!  

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