गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

एक सूखी नदी


नदी
जो कभी
भरी थी यौवन से,
सदियों की
सभ्यताएं
करती थीं
अठखेलियाँ 
इसकी उर्मियों में;
अब 
सूख चुकी है
पूरी तरह
अवशेषित और 
लुप्त हो गयी है!


हाँ,
इसकी तलहटी में बसे 
गाँवों को 
बाढ़ का खतरा 
नहीं है अब;
" कर्मांशा" 
हार चुकी है!

लेकिन 
इसके दोनों ओर
हरे जंगल
और वन्य जीव 
भी लुप्त हो गए हैं;
समय के साथ 
अब किसी 
पूर्णिमा या
अमावस पर
नहीं लगता 
जमावड़ा 
दूर-दूर  से 
आये हुए 
जन सैलाबों का;

नदी के सूखने पर 
नष्ट हो जाती हैं 
सदियों की संस्कृति
और सूख जाया करती हैं 
सभ्यताएं!

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

गर तू खुद को नींद से जगा दे !


कतरा- कतरा जिन्दगी जीने से बेहतर है 
एक पल मुस्कराते हुए  जाँ लुटा दे !

मिल जायेगी ये शोहरत भी धूल में,
बेहतर है खुद को वतन पे मिटा दे ! 

शर्म से झुकना सर का, जिल्लत है,
क्यों न मादरे-वतन पे कटा दे !

सभी राहों से पाकीज़ा है कुर्बानियों की,
अपना भी कदम एक बढ़ा दे !

बन जाएगी तेरी हस्ती भी यहाँ,
गर तू खुद को नींद से जगा दे !

कतरा- कतरा जिन्दगी जीने से बेहतर है 
एक पल मुस्कराते हुए  जाँ लुटा दे !

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !


क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर  ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !


रहबर ने गर्दिश-ए- खाकसार बना दिया,
जैसे तूफां के झोकों से दरख्त बर्बाद हुए है !

हर वक्त जो भी वख्त में मिला वो सब,
गम-ए- फुरकत में मेरे ही इन्दाद हुए हैं !


चश्म-ए-दीदार की जादूगिरी को क्या कहें,
शेख और सूफी भी न इनसे आजाद हुए है !


उजड़े ही हैं चमन यहाँ इश्क-ए-राह पर,
कहाँ - कब घरौंदें घास के आबाद हुए हैं !


क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

क्रंदन !


आह;
निकल पड़े,
वेदना के स्वर 
देख मानव का पतन !

मानव की
यह निष्ठुरता,
लुप्त प्राय सहिष्णुता;
पाषाण भी करता रुदन !

पर पीड़ा पर 
परिहास,
निज सूत का जननी पर त्रास;
धनार्जन हेतु
निर्लज्ज प्रयास;
कर रही मानवता क्रंदन !

आह;
निकल पड़े,
वेदना के स्वर 
देख मानव का पतन !

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

! अंतिम लक्ष्य !


लक्ष्य विहीन 
किस पथ पर क्लांत !
प्रबाध है तू गतिमान ?

किस हेतु
कर रहा अन्तस् श्रांत;
हो प्रमिलित 
व्यर्थ कर रहा श्राम!
ओ पथिक!
पथ से होकर भ्रांत;
तंद्रित हो,
रह गया अज्ञान !

भूल गया तू,
क्यों बना है कृत्यांत!
व्यर्थ न कर क्षण 
है लक्ष्य तेरा निर्वाण !
-- 

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

राही अनजान राहों का !


राहें बता रहीं हैं,
कोई गुजरा है 
बड़ी शिद्दत से 
मंजिल की जुस्तजू में !

कतरे-कतरे की 
खारी नमी ,
आज भी उसकी
इन्तजा की हर वो 
दास्ताँ बयाँ कर रही है !

सरगोशियाँ काफूर 
भले हो गईं हों,
गुजरे तूफाँ की 
ताशीर अब भी
सन्नाटों में सिहरन 
बढ़ा रही है !

मंजिल नही वो 
एक जंग थी,
मुकद्दर से 
जिन्दगी की
जिसकी आरजू में 
धडकने बिकती रहीं 
और सांसें चलती रहीं !

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