सोमवार, 29 जुलाई 2013

निश्छल प्राण छले गये !


प्रिये !
तुम जब से चले गये;

रजनी निज मन को व्यथित कर;
थिर अन्तस् को स्वर प्लावित कर 
मानो 
निश्छल प्राण छले गये !
प्रिये !
तुम जब से चले गये;

नहीं  सुध है अब जीवन की,
न ही कामना कोई मन की,
किंचित 
तुम तो भले गये !
प्रिये !
तुम जब से चले गये;

सोमवार, 22 जुलाई 2013

जब से पैदा होने लगे सिक्के !

पहले बोता था 
गेहूं और 
पैदा करता था
गेहूं आदमी!
जिससे पलता था
यह आदमी !!

भूल से
 न जाने कैसे;
बो गये कुछ 
सिक्के एक दिन,
फिर क्या था-

गेहूं की जगह 
जमीन 
ने शुरू कर दिए
पैदा करने सिक्के!

अब नही उगती 
गेहूं की वह फसल !
और भूखों मरने लगा 
यह आदमी !
जब से  पैदा होने लगे सिक्के!

बुधवार, 17 जुलाई 2013

मेरी पीड़ा !

मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो ,
मेरे जीवन की
मेरी ये घड़ियाँ
मुझको ही
जी जाने दो;

उन स्वप्निल
आशाओं के
बिखरन की पीड़ा,
तुम क्या जानोगे?
मेरे उस सच के
सच को
तुम क्या मानोगे ?

मान भी जाओ,
पर
मेरा  ही रह जाने दो!
मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो !

सोमवार, 8 जुलाई 2013

समर्पण


तुम्हारा वह लाल गुलाब;
आज भी उसी किताब में रखा है,
पर उसकी हर एक पांखुरी और अधर-पत्र;
सूखकर जर्जर और क्षीर्ण हो गये हैं!

तुम्हारे उस अप्रतिम उपहार को;
क्षीर्ण होने से न बचा सका ;
और तुम्हारे वो अव्यक्त उदगार,
आज भी मेरे लिए उतने ही
रहस्य-पूर्ण बने हैं!

क्योंकि मूक समर्पण की भाषा 
मैं समझ न सका था;
और उस भूल के प्रयाश्चित में
मैं और तुम्हारा लाल गुलाब 
दोनों ही रंगहीन हो गये !

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