शनिवार, 13 दिसंबर 2014

इन्तिहा

गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं;
न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं।

वक्त रोज़ गुजार देता है हमको;
सदियों से लम्हे गुजरते कहाँ हैं।

अक्सर गूँजती हैं सन्नाटों में तन्हाइयाँ;
वीरान दोनों के ही अपने जहाँ हैं।

हर शाम गुजरती है गमगीन होकर;
महफिलों में भी हम रहते तन्हा हैं।

गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं;
न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं।





 

बस आँचल को तरसते हैं आज भी......।

मकाँ तो बहुत बना लिए ,
एक घर को  तरसते हैं आज भी।

आँसू बहाना तो एक रस्म भर है,
नेह के नीर को तरसते हैं आज भी।


रिश्तों में अब वो कशिश कहाँ,
एक " रिश्ते  " को तरसते हैं आज भी।


कहने को सारी जमीं अपनी है,
खुले आसमां को तरसते हैं आज भी।

कपड़े बहुत हैं तन ढकने के लिए,
बस आँचल को तरसते हैं आज भी।

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...