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गर तू खुद को नींद से जगा दे !


कतरा- कतरा जिन्दगी जीने से बेहतर है 
एक पल मुस्कराते हुए  जाँ लुटा दे !

मिल जायेगी ये शोहरत भी धूल में,
बेहतर है खुद को वतन पे मिटा दे ! 

शर्म से झुकना सर का, जिल्लत है,
क्यों न मादरे-वतन पे कटा दे !

सभी राहों से पाकीज़ा है कुर्बानियों की,
अपना भी कदम एक बढ़ा दे !

बन जाएगी तेरी हस्ती भी यहाँ,
गर तू खुद को नींद से जगा दे !

कतरा- कतरा जिन्दगी जीने से बेहतर है 
एक पल मुस्कराते हुए  जाँ लुटा दे !

टिप्पणियाँ

  1. देशभक्ति और स्वाभिमान से जीने मार्ग अपनाने का आवाहन करने वाली कविता।

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  2. सभी राहों से पाकीज़ा है कुर्बानियों की,
    अपना भी कदम एक बढ़ा दे ...
    देश पे कुर्नाब होने वाले कम हैं आज ... बस दोहन करना चाहते हैं देश का ...
    अच्छे शेरों के माध्यम से मन की बात कही है ...

    जवाब देंहटाएं

  3. सभी राहों से पाकीज़ा है कुर्बानियों की,
    अपना भी कदम एक बढ़ा दे !

    बहुत उम्दा
    latest post"मेरे विचार मेरी अनुभूति " ब्लॉग की वर्षगांठ

    जवाब देंहटाएं
  4. देश-भक्ति से ओत-प्रोत कर गई आपकी रचना
    हार्दिक शुभकामनायें ....

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर व प्रेरणा दायक विचार ... बहुत खूब!

    जवाब देंहटाएं
  6. आपकी यह अद्वितीय प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है। कृपया अवलोकन करें। आपकी प्रतिक्रिया एवं सुझाव सादर आमन्त्रित है।

    जवाब देंहटाएं
  7. काश,सभी के अंतर में इसकी प्रतिध्वनियाँ जाग जाएँ !

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर और देश-प्रेम से ओत-प्रोत रचना ....बहुत आनंद आया . ऐसे विचरों की आज सबसे ज्यादा जरूरत है

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