सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

कोरोना और हमारा देश

कोरोना एक महामारी के साथ हमारे मुँह पर एक झंनाटेदार तमाचा भी है। हमने कभी स्वयं को इतना सुरक्षित बनाने की दिशा में प्रयास ही नहीं किए। पिछले साल से ही यदि हम कुछ सीख पाते तो यह भयानक स्थिति शायद न होती। लेकिन हम कहाँ सीखने वाले। अब भी समय है आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्रकृति को बचा लें  अन्यथा हम नहीं बच पायेंगे।  जीवन जीने के लिए मूलभूत संसाधन प्रकृति ने निःशुल्क प्रदान किए हैं  हमारा अब दायित्व है कि इसे संरक्षित करें।  अभी भी समय है स्वयं को और आने वाले कल को सुरक्षित  कर लें। “Perhaps we have learnt wrong definition of success once again think and find true value of that meant.”
हाल की पोस्ट

नहीं रह पाता हूं सहज

नहीं रह पाता हूं सहज, देखकर दुधमुंहे बच्चे की दुर्दशा। मां जानती है इसे दूध पिलाना बहुत ज़रूरी है! पर क्या करे कहां से लाए साठ रुपए किलो पानी वाला दूध। अब समाज पर शासन जो इनका है, जिन्हें अपनी शामों के लिए ज़रूरी है सिंगल माल्ट या जैकडेनियल व्हिस्की। नहीं रह पाता हूं सहज देखकर कर्णधारों की दुर्दशा।

देश विकास कर रहा है

देश विकास कर रहा है, भुखमरी, बेरोज़गारी और बीमारी से लाचार; फिर भी देश विकास कर रहा है। कभी पुलवामा,  कभी ३७०, या फिर राम मन्दिर- सबरीमाला  जब- तब लालीपोप का गुल्ला  मीडिया के द्वारा , सरकार जनता के जेहन में डाल देती है। और यहां के चार बुद्धि- जीवी टीवी पर  जीडीपी, पाक- चीन समस्या पर चपड़- धौं धौ, करके सिस्टम को कोसेंगे, और फिर सरकार यू एन के चक्कर लगाकर  जनता को  को बताएगी कि हमने पूरी दुनिया को अपने साथ ले आए हैं.  लोगो की मेहनत के पैसे टैक्स में छीन कर ये  तो मौज करते हैं और जनता  विकास के झांसे में रहती है, जबकि मूल मुद्दे वहीं के वहीं रह जाते हैं। फिर भी देश विकास कर रहा है। जब कभी आक्रोश की चिंगारी भड़कने लगती है  तो गुमराह करने के लिए  नए मुद्दे बनाए जाते हैं- गौ हत्या , दंगा, या मासूमों का बलात्कार । लेकिन कहीं न कहीं तो देश विकास कर रहा है।

चुनाव और प्रजातंत्र

भारत को आजाद हुए 70 साल पूरे हो गए और 70 सालों से यहां पर लोकतंत्र बहाल है। कहने को और संवैधानिक रूप से इस देश में प्रत्येक नागरिक स्वतंत्र है और उसके अपने मौलिक अधिकार हैं। भारत के आजाद होते ही सरकार बनाने का एकमात्र विकल्प कांग्रेस थी और जैसे सत्ता की सियासत चालू हुई भारत में राजनैतिक लिप्सा और लोलिपता बढ़ती गई। यद्यपि भारत को आजाद कराना भी एक पूर्व नियोजित अवधारणा थी जिसके चलते इस देश में रहने वाली  सीधी साधी जनता पर मनमाना शासन किया जा सके और इस अवधारणा को साकार भी किया गया जिसका परिणाम यह हुआ की लोकतंत्र एक केवल औपचारिक तंत्र रह गया। प्रत्येक 5 वर्ष पश्चात या उसके मध्य में इस राजनीतिक बाजारवाद में कुछ लोग पूर्ण रूप से व्यवसायिक होकर राष्ट्रवाद  के नाम पर अपना राजनीतिक व्यवसाय चमकाते गए और इन 70 सालों में जितनी भी सरकारे बनी उनके राजनीतिक दलों के तथाकथित व्यवसाई रूपी नेता लोग दिन दूनी रात दस गुनी तरक्की करते गए लेकिन इस देश की आम जनता आम ही रही।

कीमत

तुम आ गए हो तो रौनक आ गई है गरीबखाने  में वगरना कोई कब्रिस्तां में जश्न मनाता है क्या। एक इश्क ही तो है जिसमें लोग लुट जाते हैं, यूं ही मुफ्त में कोई वजूद अपना मिटाता है क्या। जो तुम कुछ दे देते हो एक दुआ के खातिर, वह फकीर कभी अपना एहसान जताता है क्या। मुनासिब है कि पी जाएं मयखाने को एक प्याले में डालकर, कब कौन कीमत कोई साकी की लगाता है क्या। तुम आ गए हो तो रौनक आ गई है गरीबखाने  में वगरना कोई कब्रिस्तां में जश्न मनाता है क्या।

मेरे हाकिम यह तो बता तेरा पयाम क्या है

मेरे हाकिम यह तो बता तेरा पयाम क्या है, अवाम की नजरों में  तेरा आयाम क्या है। चंद टुकड़ों खातिर देश को ही बेच दिया, ये गद्दारी नहीं तो फिर नमक हराम क्या है। फरामोशियां दिखती हैं तेरे अहसानों में, मुखालिफों के वास्ते एहतराम क्या है। बहुत सारे ख्वाब हैं इन आंखों की पलकों पर, अब ये तुम्हारी नई सुबह क्या, शाम क्या है। मिट जाएगी यह शोहरत तेरी पल भर में, बता फिर जन्नत के खातिर इंतज़ाम क्या है।

इस शहर में हर शख्स बिमार दिखता है

इस शहर में हर शख्स बिमार दिखता है, तेरी शक्ल में परवरदिगार दिखता है। कितना फरेब है दिलों में लोगों के, हर चौराहे पर बाजार दिखता है। क्या मासूमियत है इनके चेहरों पर, मुझको तो बख्तर में हथियार दिखता है। खड़ा वो शख्स जो दुश्मनों के साथ है, हमदम मेरा जिगरी यार दिखता है। वो शख्स जुबां मजहबी बोल रहा है, हमको तो सियासत दार दिखता है।