सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्त्री

 चुप रह जाती हूँ
सुनकर तुम्हारे तिरस्कृत वचन
इसलिए नहीं कि
तुम पुरुष हो,
बल्कि इसलिए 
सम्बन्धों और संस्कारों
की श्रृंखला,
कहीं कलंकित न हो जाए 
समर्पण की पराकाष्ठा ।

मुझे भी आता है
तर्क-वितर्क करना,
पर चुप रह जाती हूँ
कि कौन करेगा
सम्पूर्ण सृष्टि का संवर्धन। 
स्त्री ही बन सकती है स्त्री,
नहीं हो सकता विकल्प कोई स्त्री का ।
कहीं बिखर न जाय

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मुझे स्त्री ही रहने दो

मैं नहीं चाहूंगी बनना देवी मुझे नहीं चाहिए आठ हाथ और सिद्धियां आठ।   मुझे स्त्री ही रहने दो , मुझे न जकड़ो संस्कार और मर्यादा की जंजीरों में। मैं भी तो रखती हूँ सीने में एक मन , जो कि तुमसे ज्यादा रखता है संवेदनाएं समेटे हुए भीतर अपने।   आखिर मैं भी तो हूँ आधी आबादी इस पूरी दुनिया की।

अमरबेल

ये जो कैक्टस पर दिख रही है अमरबेल , जानते हो यह भी परजीवी है ठीक राजतन्त्र की तरह।   लेकिन लोकतंत्र में कितने दिन पनप सकेगी ये अमरबेल , खत्म होगा इसका भी अमरत्व आखिर एक दिन

चाहना

 उसने कब मुझे ही मुसलसल चाहा, जब भी चाहा - अलैहदा ही चाहा। अहदे वफ़ा की क्या दरकार करें, हमने भी उसको इस कदर न चाहा। चाहत उल्फत की थी दोनों दिलों में , मगर किसी ने भी किसी को न चाहा।   मगरूर थे सब अपनी खुद्दारी में, ज़माने भर ने ज़माने को न चाहा।   कितनी ख़ुशनुमा होती ये दुनिया, बन्दे ने गर बन्दे को होता चाहा।