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संदेश

प्रतीक्षा

अभी-अभी  तो वे गये हैं  आने को कह कर, अभी तो  बीते हैं  कुछ ही बरस, कुछ भी तो नहीं  हुआ है नीरस! खुला ही  रहने दो  इस घर का यह दर.....! अभी-अभी  तो वे गये हैं  आने को कह कर, हर- आहट  पर, चौंक उठती, रह-रह कर  कहता  क्षण धीरज धर, भ्रम से  न मन भर , कहाँ टूटी है सावन की सब्र.....! अभी-अभी  तो वे गये हैं  आने को कह कर, अभी तो  ऑंखें ही  पथराई हैं, कहाँ  अंतिम घड़ी  आयी है , अभी  प्रलय की घटा कहाँ   छाई है,  देखूँगी मैं अभी  उन्हें नयन भर....!

अस्तित्व

थक चुकी है  अब धरती; जीवन का भार ढोते -ढोते! बिखर जाना चाहती है  टूट कर, होना चाहती है विलीन  आकाश गंगा में; पुनः अपने अस्तित्व के लिए! बस प्रतीक्षा है  इसको उस "asteroid" का  जो अनंत से आ रहा है लिए एक विनाश  और पुनर्निर्माण के  प्रारम्भ का नया सोपान! ऐसे ही कितने  होते रहते है विनाश; और सृजन की प्रक्रिया चलती रहती है अनवरत! और यह "black hole" बनता रहता है, अनंत आकाश गंगाएं !

.................आदत सी हो गयी !

उल्फत -ए-रुसवाई  में  जो  मिली  जुदाई , तन्हाई  में  जीने  की  आदत  सी  हो  गयी ...............! गुजरे  हैं  जिन्दगी  के  उस  मुकाम  से  , हर  गम  पीने  की  आदत  सी  हो  गयी ..................! अब  तो  बस  दिए  हुए  उन  जख्मों  को , यादों  में  सीने  की  आदत  सी  हो  गयी .................! खुद  मेरी  मंजिल  मालूम  नहीं  मुझे , भीड़  में  खो  जाने  की  आदत  सी  हो  गयी ............! ये  ज़िंदगी  तो  अब  मुकद्दर  बन  गयी , सजा -ए - मौत  पाने  की  आदत  सी  हो  गयी . .......! सैयाद  तेरा  दाम  कितना  ही  नाजुक  हो , इस  में  ...

टूटा जो ख़्वाब इकरार करते-करते

एक मुद्दत से प्यासी थीं नजरें, रात गुज़र गयी दीदार करते-करते! लफ्ज़ मचलते ही रहे लबों पे; टूट गयी सब्र इजहार  करते- करते! शब- ए- फुरकत में सिमट गये लम्हे; उभरे जो ज़ख्म ऐतबार  करते- करते! रूह से इक आह सी निकल गयी; टूटा जो ख़्वाब इकरार  करते- करते! एक मुद्दत से प्यासी थीं नजरें, रात गुज़र गयी दीदार करते-करते!

कृत्यांत

लक्ष्य विहीन पथ पर; भ्रमित गतिज है यह जीवन! न स्थायित्व न ही आलम्बन दृढ़; नीरवता और भी  गह्वर हो रही है! जीवन- लक्ष्य में भटकाव है! सांसों की गतिशीलता जीवन लक्षण है, लक्ष्य नही! सृजेयता की आशाओं को  व्यर्थ न करो! तुम्हीं तो कृत्यांत हो  इस सृजन बिंदु के!

क्यूं हुआ मेरा जन्म!

क्यूं हुआ मेरा जन्म , क्या था मेरा अभिशाप, किस कर्म फल का यह प्रायश्चित , जिसे मैं घुट-घुट कर , मर-मर कर जी रही हूँ ?? घर -बाहर हर जगह , यह महा विभेद! 'नारी उत्थान ' अधिकारों की समानता , कितना मृदु -तीक्ष्ण व्यंग्य , नारी के द्वारा ही , नारी को अभिशापित करने की क्रूर प्रथा!! धन्य है वह (नारी) जिसे मार दिया गया, जन्म से पहले ही , जिसे उबार दिया गया ! रचा गया फिर एक नया सिद्धांत भ्रूण हत्या को , संवैधानिक पाप करार दिया गया ! वाह ऱी सभ्यता! तू और मैं दोनों में कितनी समानता है ? दोनों की हत्याएं हो रही हैं , और मूक होकर हम रो रही हैं , क्योंकि हमारा "जेंडर" एक ही तो है!

अय, अमरते !

अय, अमरते तू ! क्यों कर लुभाती है ? इन चिर श्रमित , नीरस प्राणों को झकझोर हिलाती है! मृत्यु के गह्वर रहस्य से, क्षण भर को ही भिग्य तो होने दे! अनंत के सास्वत लक्ष्य से, इस अत्न को , विज्ञ तो होने दे ! निर्वाण के अनसुलझे चिर रहस्य को क्यों अब और उलझाती है ? अय, अमरते तू ! क्यों कर लुभाती है ?