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टूटा जो ख़्वाब इकरार करते-करते

एक मुद्दत से प्यासी थीं नजरें,
रात गुज़र गयी दीदार करते-करते!

लफ्ज़ मचलते ही रहे लबों पे;
टूट गयी सब्र इजहार करते-करते!

शब- ए- फुरकत में सिमट गये लम्हे;
उभरे जो ज़ख्म ऐतबार करते-करते!

रूह से इक आह सी निकल गयी;
टूटा जो ख़्वाब इकरार करते-करते!

एक मुद्दत से प्यासी थीं नजरें,
रात गुज़र गयी दीदार करते-करते!

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स्त्री !

चाणक्य ! तुमने कितनी , सहजता से कर दिया था; एक स्त्री की जीविका का विभाजन ! पर, तुम भूल गये! या तुम्हारे स्वार्थी पुरुष ने उसकी आवश्यकताओं और आकाँक्षाओं को नहीं देखा था! तुम्हें तनिक भी, उसका विचार नही आया; दिन - रात सब उसके तुमने अपने हिस्से कर लिए! और उसका एक पल भी नहीं छोड़ा उसके स्वयं के जीवन जीने के लिए!

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