सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अलफ़ाज़ अपने जख्म दिखाने लगे!

इस दौर में किसका करें ऐतबार;
जब अपने ही आजमाने लगे!

भरोसा तो गैरों का भी था बहुत;
अब बेगाने हक जताने लगे!

हर कोई तो है गम जदा यहाँ पर;
कौन किसे दास्ताँ सुनाने लगे!

लफ्जों को जो हम बयाँ करने चले;
अलफ़ाज़ अपने जख्म दिखाने लगे!

रूठ जाएगी एक दिन ये जिन्दगी,
हिसाब सांसों का लगाने लगे!

टिप्पणियाँ

  1. वाह ,,,, बहुत खूब, बेहतरीन प्रस्तुति,,,,,आस्थाना जी,,,

    जवाब देंहटाएं
  2. अब इस जिंदगी का हिसाब किताब लगाना छोड़ दीजिए

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

स्त्री !

चाणक्य ! तुमने कितनी , सहजता से कर दिया था; एक स्त्री की जीविका का विभाजन ! पर, तुम भूल गये! या तुम्हारे स्वार्थी पुरुष ने उसकी आवश्यकताओं और आकाँक्षाओं को नहीं देखा था! तुम्हें तनिक भी, उसका विचार नही आया; दिन - रात सब उसके तुमने अपने हिस्से कर लिए! और उसका एक पल भी नहीं छोड़ा उसके स्वयं के जीवन जीने के लिए!

बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।