सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अंत हीन यात्रा

घिसटते हुए
पैरों में पड़े छाले;
और अंत हीन 
ये उलझे हुए रास्ते!
थकी हुयी जिन्दगी
और बोझिल सांसें,
नहीं थकती तो 
जिजीविषा और
न खत्म होने वाली 
चिर आकांक्षा !
सभी गतिमान हैं 
अनंत की ओर
अनंत काल के लिए !
अंत हीन यात्रा पर !

टिप्पणियाँ

  1. नहीं थकती तो जिजीविषा .... यह कविता एक गंभीर चिंतन है .

    जवाब देंहटाएं
  2. धीरेन्द्र भाई
    इस गम्भीर कविता को पढ़ कर समझना मेरे बस में नहीं
    इसे साथ ला जा रहीं हूँ नई-पुरानी हलचल में
    मिल-बैठ कर पढ़ेंगे सभी इसी शनिवार 15-9 को
    आप भी आइये न... अपनी पूर्व परिचित नई-पुरानी हलचल में
    इसी शनिवार 15-9 को
    सादर
    यशोदा

    जवाब देंहटाएं
  3. जिजीविषा ही नहीं थकनी चाहिए ..... सुंदर अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  4. यह जिजीविषा ही तो उसकी शक्ति है ...सुन्दर और गहन !

    जवाब देंहटाएं
  5. अच्छी रचना !
    वो मंज़िल क्या..जिसे पाने को..
    पैरों के छाले फूटे ना....

    जवाब देंहटाएं
  6. इस यात्रा को यूं चलते ही रहना है,जीवन की यही नियति है।


    सादर

    जवाब देंहटाएं
  7. सच, हम सभी अनंत यात्रा के यात्री हैं

    जवाब देंहटाएं
  8. एकदम आध्यात्मिक । अनंत की और अनंत यात्रा के साथी ।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

स्त्री !

चाणक्य ! तुमने कितनी , सहजता से कर दिया था; एक स्त्री की जीविका का विभाजन ! पर, तुम भूल गये! या तुम्हारे स्वार्थी पुरुष ने उसकी आवश्यकताओं और आकाँक्षाओं को नहीं देखा था! तुम्हें तनिक भी, उसका विचार नही आया; दिन - रात सब उसके तुमने अपने हिस्से कर लिए! और उसका एक पल भी नहीं छोड़ा उसके स्वयं के जीवन जीने के लिए!

बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।