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संदेश

इन्तिहा

गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं; न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं। वक्त रोज़ गुजार देता है हमको; सदियों से लम्हे गुजरते कहाँ हैं। अक्सर गूँजती हैं सन्नाटों में तन्हाइयाँ; वीरान दोनों के ही अपने जहाँ हैं। हर शाम गुजरती है गमगीन होकर; महफिलों में भी हम रहते तन्हा हैं। गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं; न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं।  

बस आँचल को तरसते हैं आज भी......।

मकाँ तो बहुत बना लिए , एक घर को  तरसते हैं आज भी। आँसू बहाना तो एक रस्म भर है, नेह के नीर को तरसते हैं आज भी। रिश्तों में अब वो कशिश कहाँ, एक " रिश्ते  " को तरसते हैं आज भी। कहने को सारी जमीं अपनी है, खुले आसमां को तरसते हैं आज भी। कपड़े बहुत हैं तन ढकने के लिए, बस आँचल को तरसते हैं आज भी।

तोड़ कर दिल कोई जब........

तोड़ कर दिल कोई जब रिश्तों की बात करता है। जैसे जिन्दगी उधार हो और किश्तों की बात करता है। उम्र भर दुश्मनी से दामन जोड़, फरिश्तों की बात करता है। लूट कर रात दिन का सुकून, गुलिश्तों की बात करता है।। तोड़ कर दिल कोई जब रिश्तों की बात करता है।

हार क्यों मानूं अभी से

जिन्दगी कोई बिना जिन्दगी के गुजरती नहीं, सांसें दौड़  रहीं हैं समय को हराने के लिए। भले ही हार जायेंगी एक दिन । तब तक हार मान कर खुद ही टूटने वाली नहीं हैं। फिर भला मैं ये कैसे मान लूँ कि हार चुका हूँ! जब तक हारा नहीं हूँ, जीत की उम्मीद पर जी तो सकता हूँ, जी भर कर ।।

बस भी करो

तुमने लिखा पानी, कहीं जलजला था, पर आदमी की आँखों का पानी मर चुका था। तुमने लिखी पीड़ा, कराहों और चीख़ों से गूँजते रहे सन्नाटे। तुम जब लिखने लगे भूख; जबरन रोकना पड़ा मुझे तुम्हारा हाथ बर्दाश्त के बाहर थी उस नवजात की चीख़ उसकी माँ को अभी मिटानी थी बहशियों की भूख।  

प्रेम

तुम्हें मुझसे ही क्यों प्रेम होना था; किस्मत का रूठ जाना अच्छा था, इन सांसों का टूट जाना अच्छा था। भला कोई बिना प्रिय के भी जी पाता है; फिर यह प्रेम यूँ ही क्यों हो जाता है। मुझे मेरी पीड़ा का तो मलाल नहीं, पर तुम्हारी वेदना मुझे व्यथित कर जाती है। प्रिये ! मैं तुमसे कहूँ, भुला दो मुझे; पर क्या मुमकिन होगा, तुम्हें भूल जाना मेरे लिए।

दरिंदे : एक नश्ल

क्या तुमने कभी देखा है, दो पैरों वाले बहशी जानवर को, ( जानवर शब्द के प्रयोग से  जानवर जाति का अपमान है ) यदि नहीं, तो अपनी  रुह से पूछो, अभी तक जिन्दा क्यों है। क्या दरिंदगी का सबसे वीभत्स रूप ईश्वर ने तुम्हारी रूह को दिया है। सृजेयता को भी ग्लानि होती होगी, देखता होगा जब तुम्हारे कुकृत्यों कों