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बस भी करो

तुमने लिखा
पानी,
कहीं जलजला था,
पर
आदमी की आँखों का
पानी मर चुका था।


तुमने लिखी
पीड़ा,
कराहों और चीख़ों से
गूँजते रहे सन्नाटे।


तुम जब लिखने लगे
भूख;
जबरन रोकना पड़ा मुझे
तुम्हारा हाथ
बर्दाश्त के बाहर थी
उस नवजात की चीख़
उसकी माँ को अभी
मिटानी थी
बहशियों की भूख।
 

टिप्पणियाँ

  1. बहुत कम लोग पहुँच पाएंगे गहराई तक...

    जब दुनियां के लिए भूख लिखी गयी
    तो बहुत सी मजबूरियां और शरहदें तोहफे में मिली

    रंगरूट

    जवाब देंहटाएं
  2. दिखने /लिखने और होने के मध्य संवेदनाओं को झकझोरती है रचना !
    मार्मिक !

    जवाब देंहटाएं
  3. गहरे अर्थ संजोये सुंदर प्रस्तुति।।

    जवाब देंहटाएं

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