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इस पत्थर के शहर में


इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

यहाँ का शोर अन्नत के 
सन्नाटे में विलीन हो जाता है 
तुम्हारी चीखों को कौन सुनेगा ?
कुछ भी बोलोगे तो तुम भी 
पत्थर के हो जाओगे 
इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

यहाँ दिल वाले तो हैं 
पर दिल की बीमारी को ढोते हैं 
रातों में वो जगते हैं 
दिन के उजाले में सोते हैं 
इनसे नाता जोड़ोगे तो 
तुम भी तुम से  खो जाओगे
इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

हर गलियों में लाशें बिछी हैं 
हर राहों पर आहों ने दम तोडा है 
रोटी की खातिर सब ने यहाँ 
अपने अरमानो को छोड़ा है 
इन राहों पर कैसे तुम चल पाओगे 
इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

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