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! अंतिम लक्ष्य !


लक्ष्य विहीन 
किस पथ पर क्लांत !
प्रबाध है तू गतिमान ?

किस हेतु
कर रहा अन्तस् श्रांत;
हो प्रमिलित 
व्यर्थ कर रहा श्राम!
ओ पथिक!
पथ से होकर भ्रांत;
तंद्रित हो,
रह गया अज्ञान !

भूल गया तू,
क्यों बना है कृत्यांत!
व्यर्थ न कर क्षण 
है लक्ष्य तेरा निर्वाण !
-- 

टिप्पणियाँ

  1. राह दिखाती पंक्तियाँ...
    सुन्दर शब्दसंयोजन...

    अनु

    जवाब देंहटाएं
  2. लक्ष्‍य सबका निर्वाण ही है। नए शब्‍द-संयोजन से युक्‍त सार्थक कविता।

    जवाब देंहटाएं

  3. रंगीन दुनिया के चक्कर में पथिक लक्ष्य से भ्रमित हो गए हैं .सच कहा आपने
    latest post सुहाने सपने

    जवाब देंहटाएं
  4. शानदार सार्थक प्रस्तुति हेतु बधाई

    जवाब देंहटाएं

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?