जैसे दीपक के जलने से
जलता है अँधेरा ,
और अँधेरे के जलने से
जलती है रात !
ठीक वैसे ही
क्यों नहीं जलती
ईर्ष्या हमारे दिलों की !
जलाने से तो जलता है
जल भी ,
तो जलनशील
चीजों को जलने में
फिर कैसी देर !
जला दो दिलों की जलन को
कि जलने लगें
हमारे दिलों में
फिर से उजालों के दीप !
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-06-2015) को "बेवकूफ खुद ही बैल हो जाते हैं" {चर्चा अंक-2006} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
धन्यवाद सर ।
हटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंआमीन .. काश ये दीप जल सकें ...
जवाब देंहटाएंbahut badhiya
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