सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कोरोना और हमारा देश



कोरोना एक महामारी के साथ हमारे मुँह पर एक झंनाटेदार तमाचा भी है।

हमने कभी स्वयं को इतना सुरक्षित बनाने की दिशा में प्रयास ही नहीं किए।


पिछले साल से ही यदि हम कुछ सीख पाते तो यह भयानक स्थिति शायद न होती।

लेकिन हम कहाँ सीखने वाले।


अब भी समय है आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्रकृति को बचा लें 

अन्यथा हम नहीं बच पायेंगे। 

जीवन जीने के लिए मूलभूत संसाधन प्रकृति ने निःशुल्क प्रदान किए हैं 

हमारा अब दायित्व है कि इसे संरक्षित करें। 

अभी भी समय है स्वयं को और आने वाले कल को सुरक्षित  कर लें।


“Perhaps we have learnt wrong definition of success once again think and find true value of that meant.”

टिप्पणियाँ

  1. सही कहा आपने।
    हम अभी भी ठोकर से कुछ नहीं सीखे।
    मैंने प्रकृति के सहयोगी के तौर पर अभियान चला रखा है। इसी अभियान पर आधारित ब्लॉग भी बनाया। आप चाहो तो इसके तहत इससे जुड़ सकते हो।
    ब्लॉग का लिंक पौधे लगायें धरा बचाएं

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

स्त्री !

चाणक्य ! तुमने कितनी , सहजता से कर दिया था; एक स्त्री की जीविका का विभाजन ! पर, तुम भूल गये! या तुम्हारे स्वार्थी पुरुष ने उसकी आवश्यकताओं और आकाँक्षाओं को नहीं देखा था! तुम्हें तनिक भी, उसका विचार नही आया; दिन - रात सब उसके तुमने अपने हिस्से कर लिए! और उसका एक पल भी नहीं छोड़ा उसके स्वयं के जीवन जीने के लिए!

बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।