सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हम और हमारा भोजन

 सबसे पहले हम यह जान लें की हमारे लिए सबसे जरूरी हमारा शरीर और इसका स्वास्थ्य है।

इसके लिए आवश्यक है कि हम आवश्यकता के अनुसार भोजन लें जोकि  वायु, जल , और खाद्यान से प्राप्त होता है।
अब
प्रश्न यह है कि  हमारे लिए क्या और कितना भोजन आवश्यक होता है ?
यह निर्धारित करने के लिए हमें अपने शारीरिक क्षमता , श्रम और वातावरण के अनुसार भोजन को ग्रहण करना चाहिए। भोजन के साथ साथ हमें भोजन की मूल अवस्था ( नेचुरल फॉर्म ) का सबसे अधिक ध्यान रखना होगा।

                                                सुने
स्वयं के शरीर की


अक्सर हम रायचंदों और व्यावसायिक चिकित्सकों के मतानुसार दवाईयों और उनके द्वारा बताये गए उपचार के भ्रम में आकर अच्छे भले स्वास्थ्य का सत्यानाश कर लेते हैं।   जबकि हमारे शरीर  का स्व - तंत्र  पर्याप्त चिकित्सक है। 
हमारे शरीर पर ग्राह्य भोज्य के प्रभाव  उसके रूप और अवस्था के अनुरूप पड़ते हैं।  और इस के लिए हमारी  सोच  भी अपना अभिन्न योगदान करती है।

सबसे पहले यह जान लें कि आपकी मनः स्थिति ही किसी व्यवस्था, व्यक्ति और उसकी स्थिति को महत्त्वपूर्ण और सामान्य निर्धारित करती है , जिसका सीधा प्रभाव आपकी जीवन चर्या पर पड़ता है। 
प्रकृति ने हमें जो भी संसाधन प्रदान किये हैं उनमे. भोजन सबसे महत्त्वपूर्ण है जिसे कि  हमें उसी मूल  रूप में ही ग्रहण करना चाहिये।


continue..............................

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

स्त्री !

चाणक्य ! तुमने कितनी , सहजता से कर दिया था; एक स्त्री की जीविका का विभाजन ! पर, तुम भूल गये! या तुम्हारे स्वार्थी पुरुष ने उसकी आवश्यकताओं और आकाँक्षाओं को नहीं देखा था! तुम्हें तनिक भी, उसका विचार नही आया; दिन - रात सब उसके तुमने अपने हिस्से कर लिए! और उसका एक पल भी नहीं छोड़ा उसके स्वयं के जीवन जीने के लिए!