शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

रात गुज़र जाएगी

मेहरबानियां उनकी इसकदर हैं मुझपर,
गिनने बैठूंगा तो रात गुज़र जाएगी !

रहने दो ख़ामोश लबों को,
असर होने दो दुवाओं का;
जख्म की नुमाइश में बात गुज़र जाएगी !

सितमगर तेरा हरेक सितम,
मेहरबानी से बढ़कर है मेरे लिए;
ठहर गया जो लम्हा, सौगात गुज़र जाएगी!

तड़प उठता है ज़िगर इक याद पे,
सब्र कर लेता हूँ ये सोंचकर;
छूली जो तस्वीर तेरी, ऐतिहात गुज़र जाएगी!

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

प्रेम

आज तुम्हारा चित्र
हाथ में क्या आया
 गुजरा कल फिर से
यादों में जीवन्त हो उठा।

तुम्हारे साथ बिताए हुए हर लम्हे,
तुम्हारी बात बात पर बेबात की मुस्कुराहट
और हमारे न बिछड़ने के वादे।

अच्छा, ये बताओ क्या मैं तुम्हें तनिक भी नहीं याद आता हूँ,
फिर मुझे भूख से पहले और मेरी मामूली सी बीमारी में हिचकियाँ क्यों आती हैं।

अच्छा सुनो
एक बार अपने मन ही मन
वे शब्द कह दो
जिससे जीवन की गति मंथर न हो।
मेरी सांसों को उन शब्दों का इन्तजार अब भी है।

मालूम है
बहुत विवश हो,
तुम्हारी विवशता मैं समझता हूँ
पर दिल को कैसे दिलासा दूँ,
वह तो तुम्हें ही सुनने और
महसूसने की जिद किये बैठा है।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

सच तो यही है

एक बच्ची
उड़ती है आज़ाद परिंदे सी,
ख्वाबों के आसमानों में।

एक लड़की
छुपा रही है खुद को
कुछ जोड़ी बहसी आँखों से।

एक औरत
घोट रही है खुद का ही गला 
डर है कि फाँसी पर न लटका दी जाय।

सीढ़ी और कंधे

आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी 
किसी के कंधे पर से 
होकर ही गुजरती है।

जैसे आगे बढ़ रहा 
मार्क्सवाद के कंधों पर चढ़कर पूँजीवाद;

जैसे बढ़ा था कभी
बंधुवा मजदूर के कंधों पर चढ़कर जमींदार।

ठीक वैसे बढ़ रही है
जनता के कंधों पर चढ़कर सरकार।

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे,
ज़माना फिर से गुज़र गया।

इक सूखा सा दरख्त कोई,
हरा हो फिर से शज़र गया।

कोई लम्हा टिक कर रहता नहीं,
सन्नाटा सदियों का पसर गया।

तीरगी क्या थी जुम्बिशों की
जिसमें डूब ही समंदर गया ।

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी,
दुःख-सुख के लम्हों से संवरती चली गयी।

जैसे ही हुआ पैदा, रिश्तों ने बांध लिया,
जोड़-तोड़ में जिंदगी बिखरती चली गयी।

रोटी,पैसा और फिर अपनों की तलाश में
राहे गुजर में यहाँ-वहाँ भटकती चली गयी।

जिस दीवार के सर पे थी छत टिकी हुयी,
क्यों वो नेह की दीवार दरकती चली गयी।

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी,
दुःख-सुख के लम्हों से संवरती चली गयी।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

हम हुए आजाद......., कि आज रोटी पकेगी।

हम हुए आज़ाद
कि आज रोटी पकेगी,
हुयी महंगी दाल
कि तरकारी रंधेगी........
हम हुए आज़ाद..........


डंडे खाये -लाठी खायी
और कुछ ने तो अपनी
गरदन भी कटवायी,
कि जशन पै आज
मुला दारू बटेगी......
हम हुए आजाद........।


सरकार बड़ी सरकारी है,
जनता की तो लाचारी है।
इस्कूल सबै गिर गए हैं
मुला किताबें खूब बिकेंगी.....
हम हुए आजाद.......।


मरीज़ मरि रहे अस्पतालों में,
डाकडर मस्त हैं भेड़चालों में
मेडिसिन सब बिलैक् भईं,
मुला दवाई खूब बनेंगी........
हम हुए आजाद.......,
कि आज रोटी पकेगी।

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

भढुवे

ये भढुवे हैं,
रखते हैं स्त्री को
वक्त की चाक पर;

पर भूल जाते हैं,
धुरी में रहने वाली
स्त्री को ।

न चाहकर भी,
स्त्री हो जाती है विवश
कि बचा रहे स्त्रीत्व
वक्त की चाक पर ।

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

चलता जा राही......

चलता जा राही
साँसों के चलने तक,
रुकना न कभी
मंजिल के मिलने तक।
चलता जा राही..........

जीवन क्या है
बहती एक धारा है,
जीता वही जो
मन से कभी न हारा है।
रात अभी कहाँ,
सूरज के ढलने तक।
चलता जा राही
साँसों के चलने तक।

सुख-दु:ख
तो आने जाने हैं
पल भर को
ही खोने पाने हैं
जलना ही जीवन है
जलता जा
तम के हरने तक,
चलता जा राही
साँसों के चलने तक।

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

भूख

शरीर के
धारण करते ही
पैदा हो जाती है
भूख,
जो मरने तक
बनी रहती है ।
सारा जीवन
इसी भूख के इर्द-गिर्द
घूमता रहता है
काल के पहिये की मानिन्द।
भूख कभी नहीं मरती,
मार देती है
संवेदनाएं
वेदनाएं
और सीमाएं ।
हम भूख को
जिन्दा रखने के लिये
मारते रहते हैं
जीवन को ।
भूख और जीवन
दोनों ही नहीं
मरते कभी ।
या
भूख के मरने से पहले
मर जाता है जीवन,
कि जीवन के मरते ही
मर जाती है भूख।

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

गुलामी की राह पर बढ़ते कदम


हम देशवासी सरकारों से उम्मीद करते हैं कि हमें स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन और सुरक्षा मिलेगी ।
पर मिलता क्या है?
रोटियों के लिये स्त्रियों को लुटना पड़ता है,
सुरक्षा करने वाले रक्षक मौका पाते ही नोच डालते हैं। रईस लोग अपनी शाम रंगीन करने के लिये कितनी ही पुत्रियों की जिन्दगियाँ नरक बना देते हैं ।
हर सरकार नई नई कागजी योजनायें बनाकर हमारे ही पैसों को डकार जाती हैं।
हम दिन पर दिन कर्ज में डूब रहे हैं, सत्ता और विपक्ष मिलकर हमें लूटते रहते हैं , थोड़े व्यक्तिगत लाभ के लिये हम इन्हीं धूर्तों को सत्ता सौंप देते हैं और ये लोग हमें धर्म के नाम पर गुमराह करके अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं।
सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम जानते हुये बार बार यही गलती करते हैं।
हम गुलामी की ओर अग्रसर हैं और हमारी सन्तानें दासता का जीवन जीने के लिये मजबूर हो रहीं हैं ।
आइए इस गुलामी की तरफ कदम से कदम मिलाकर चलें, कहीं भविष्य का गौरवशाली इतिहास कलंकित न हो जाय कि हमारी पीढ़ी ने देश गुलाम बनाने में योगदान नहीं किया, या शायद इतिहास ही न लिखने लायक रहे यह देश ।

शनिवार, 13 जून 2015

उजालों के दीप !

जैसे दीपक के जलने से 
जलता है अँधेरा ,
और अँधेरे के जलने से 
जलती है रात !
ठीक वैसे ही 
क्यों नहीं जलती 
ईर्ष्या हमारे दिलों की !


जलाने से तो जलता है 
जल भी ,
तो जलनशील 
चीजों को जलने में 
फिर कैसी देर !

जला  दो दिलों की जलन को 
कि जलने लगें 
हमारे दिलों में 
फिर से उजालों के दीप !

मंगलवार, 19 मई 2015

अंतिम कविता का पहला अंश

ओह !
इन चमकते रेत के दानों में 
आज भी हमारे साथ बिताये 
पलों की चमक वैसी ही है ।

और 
जेहन में उन ठहरे हुये लम्हों की
यादें बिल्कुल वैसी ही ताजी हैं
जैसे अभी खिली हुयी गुलाब की कली ।


आह ! 
कितना सुखद था ये बीता हुआ ख्वाब;
जिसमें पल भर के लिये
तुम मेरे पास आये तो सही ।




क्यों 
मैं देख रहा हूँ खुली आखों से 
अब भी तुम्हारा ही ख्वाब ।
कि जैसे तुम गये ही नहीं हो कहीं।


हाँ 
मैं फिर कहता हूँ 
कि मैं नहीं कह सकता 
उन शब्दों को जो 
तुम सुनना चाहते हो ।



बस 
तुम पढ़ लो मेरे खामोश 
लबों पर थिरकते हुये 
वो अपने प्रिय शब्द ।




मंगलवार, 10 मार्च 2015

मुझे मेरे यार का ठिकाना बता दे !

तुझे मंदिर , मस्जिद काबा मुबारक ,
मुझे मेरे यार का ठिकाना बता दे !

सलीका क्या है तेरी महफ़िल का ,
साकी मुझे मेरा पैमाना बता दे !

नूरे-चश्म की मयकशीं का नशा कहाँ ,
रहे न होश वो मयखाना बता दे !

तरसती है ये निगाह दीदार को ,
दीदारे-यार नजराना बता दे !

बाकी भी गुजर जाय खुशफहमी में ,
गमे-दिल का सनम खजाना  बता दे !​

बुधवार, 14 जनवरी 2015

किस खता की सजा दिये जाते हो

किस खता की सजा दिये जाते हो;
खुद ही खुद से अजनबी हुए जाते हो ।

माना गमों का साथ है तमाम उम्र भर;
नाहक ही अश्कों को पिए जाते हो।

सब्र करलो ,सब कुछ नहीं मिलता सबको,
क्यों कर ही मुफलिसी में जिये जाते हो ।

बादलों की छाँव का क्या यकीन करना ,
धूप पर भी क्यों यकीन किये जाते हो।

स्वप्न सी है यह दुनिया दिखावे की दोस्तों,
हकीकत से क्यों दुश्मनी किये जाते हो।

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

इन्तिहा

गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं;
न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं।

वक्त रोज़ गुजार देता है हमको;
सदियों से लम्हे गुजरते कहाँ हैं।

अक्सर गूँजती हैं सन्नाटों में तन्हाइयाँ;
वीरान दोनों के ही अपने जहाँ हैं।

हर शाम गुजरती है गमगीन होकर;
महफिलों में भी हम रहते तन्हा हैं।

गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं;
न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं।





 

बस आँचल को तरसते हैं आज भी......।

मकाँ तो बहुत बना लिए ,
एक घर को  तरसते हैं आज भी।

आँसू बहाना तो एक रस्म भर है,
नेह के नीर को तरसते हैं आज भी।


रिश्तों में अब वो कशिश कहाँ,
एक " रिश्ते  " को तरसते हैं आज भी।


कहने को सारी जमीं अपनी है,
खुले आसमां को तरसते हैं आज भी।

कपड़े बहुत हैं तन ढकने के लिए,
बस आँचल को तरसते हैं आज भी।

सोमवार, 24 नवंबर 2014

तोड़ कर दिल कोई जब........

तोड़ कर दिल कोई जब
रिश्तों की बात करता है।

जैसे जिन्दगी उधार हो और
किश्तों की बात करता है।

उम्र भर दुश्मनी से दामन जोड़,
फरिश्तों की बात करता है।

लूट कर रात दिन का सुकून,
गुलिश्तों की बात करता है।।

तोड़ कर दिल कोई जब
रिश्तों की बात करता है।

बुधवार, 12 नवंबर 2014

हार क्यों मानूं अभी से

जिन्दगी
कोई बिना जिन्दगी के
गुजरती नहीं,

सांसें दौड़ 
रहीं हैं
समय को हराने के लिए।
भले ही हार जायेंगी
एक दिन ।

तब तक
हार मान कर
खुद ही टूटने वाली नहीं हैं।
फिर भला मैं
ये कैसे मान लूँ
कि हार चुका हूँ!

जब तक
हारा नहीं हूँ,
जीत की उम्मीद पर
जी तो सकता हूँ,
जी भर कर ।।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बस भी करो

तुमने लिखा
पानी,
कहीं जलजला था,
पर
आदमी की आँखों का
पानी मर चुका था।


तुमने लिखी
पीड़ा,
कराहों और चीख़ों से
गूँजते रहे सन्नाटे।


तुम जब लिखने लगे
भूख;
जबरन रोकना पड़ा मुझे
तुम्हारा हाथ
बर्दाश्त के बाहर थी
उस नवजात की चीख़
उसकी माँ को अभी
मिटानी थी
बहशियों की भूख को ।
 

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...