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तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।
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अपना हिसाब फरेबी लिखते हैं

ये वो लोग हैं जो बाजार खरीदते हैं।
ना कभी हारते हैं ना कभी जीतते हैं ।

हर शाम सौदा होता है इमानदारी का,
 हर शाम जमीर यहां पर बिकते हैं ।

कुछ एक हैं इस बाजार में अब भी,
जो अपना हिसाब फरेबी लिखते हैं।

लोग बड़े ही शातिर है लेन-देन में,
काली नीयत उजला लिबास रखते हैं।

होशियार रहना देश के इन गद्दारों से,
नेता जो कुछ कुछ शरीफ दिखते हैं।

ये वो लोग हैं जो बाजार खरीदते हैं।
ना कभी हारते हैं ना कभी जीतते हैं ।

जब से वो मेरे साथ सरेआम हो गया है

जब से वो मेरे साथ सरेआम हो गया है,
इस शहर में वो भी बदनाम हो गया है।।


लोग यूं ही नहीं उठाते हैं अंगुलियां मुझ पर
शहर के रहीसों में मेरा भी नाम हो गया है।

जलते हैं तो जलने दो, ये जमाने वाले हैं;
इनका तो जलते रहना ही काम हो गया है।

जरायम पेशा जब से हुए सफ़ेदपोश,
लुच्चे लफंगों का जीना हराम हो गया है।

जो था कभी रिंद के लबों का लफ्ते जिगर,
महफिल का टूटा हुआ जाम हो गया है।

जब से वो मेरे साथ सरेआम हो गया है,
इस शहर में वो भी बदनाम हो गया है।।

बड़े बड़े करते हैं मुजरा जिंदगी की थाप पर

बड़े बड़े करते हैं मुजरा जिंदगी की थाप पर,
गुजरते ही लोग रख देंगे तुम्हें भी ताख पर।

गुरूर करना ठीक नहीं होता किसी के लिए,
गर्दिशे खाक हुए जो थे जमाने की आंख पर ।

रौशन थे जो सितारे फलक पर कभी,
बुझ गये सभी चिता की ठंडी राख पर।

भरने को पेट, ढकने को बदन काफी है,
कोई नहीं खरीदता है कफ़न नाप कर ।

भूखे को निवाला दे, रोते हुए को हंसा,
मिटाकर नफरत दिलों से, खुद को आफताब कर।

बड़े बड़े करते हैं मुजरा जिंदगी की थाप पर,
गुजरते ही लोग रख देंगे तुम्हें भी ताख पर।

यूं ना जिंदगी को जार जार करिए

यूं ना जिंदगी को जार जार करिए,   
थोड़ा सा खुद से भी प्यार करिए।   

ये इश्क का मुवामला है बर्खुरदार,। 
जरा सा जीत को भी हार करिए। 

हो जरूरत जंग में जो शहादत की,
कुरबान खुद को बार-बार करिए।

ठीक नहीं मजहबी सियासत करना,
इरादों का अपने इश्तिहार करिए ।

जुल्म की जंग हो गई है पेचीदा,     
कलम और थोड़ा धारदार करिए।

कैसे-कैसे लोग साहिबे मसनद हो गए

कैसे-कैसे लोग साहिबे मसनद हो गए,
लोग मजहबी सब, दहशत गर्द हो गए।

बिक जाती हैं बेटियां रोटियों खातिर,
छाले सब रूह के बेदर्द हो गए ।

सियासती दंगों की फसल क्या लहराई,
शहर के सारे हिजड़े मर्द हो गए।

कौन पूछता है सबब गरीबी का ,
बेटी जवान क्या हुई सब हमदर्द हो गए।

राहे- गुजर के पत्थर हुआ करते थे,
वक्त क्या बदला सबके सब गुम्बद हो गये।

अवाम तरसती रही निवालों के लिए,
सरकार वो बे-रहम बेहद हो गये।

कैसे-कैसे लोग साहिबे मसनद हो गए,
लोग मजहबी सब, दहशत गर्द हो गए।

मैं खरीद दार जो हूं.....

सिस्टम में नहीं फिट बैठता, क्या करूं,
थोड़ा सा मैं ईमानदार जो हूं।

रो पड़ता हूं किसानों की खुदकुशी पर ,
थोड़ा सा मैं जमीनदार जो हूं।

नहीं बेचा जाता मुझसे मेरा ज़मीर,
थोड़ा सा मैं ज़मीर दार जो हूं।

नहीं देखी जाती मुझसे अब ये लाचारी,
थोड़ा सा मैं तामीर दार जो हूं।

कैसे न करूं खरीद-फरोख्त ग़मे-बाजार में
थोड़ा सा मैं खरीद दार जो हूं।