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निश्छल प्राण छले गये !

प्रिये ! तुम जब से चले गये;
रजनी निज मन को व्यथित कर; थिर अन्तस् को स्वर प्लावित कर  मानो  निश्छल प्राण छले गये ! प्रिये ! तुम जब से चले गये;
नहीं  सुध है अब जीवन की, न ही कामना कोई मन की, किंचित  तुम तो भले गये ! प्रिये ! तुम जब से चले गये;

जब से पैदा होने लगे सिक्के !

पहले बोता था 
गेहूं और  पैदा करता था गेहूं आदमी! जिससे पलता था यह आदमी !!
भूल से  न जाने कैसे; बो गये कुछ  सिक्के एक दिन, फिर क्या था-
गेहूं की जगह  जमीन  ने शुरू कर दिए पैदा करने सिक्के!
अब नही उगती  गेहूं की वह फसल ! और भूखों मरने लगा  यह आदमी ! जब से  पैदा होने लगे सिक्के!

मेरी पीड़ा !

मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो ,
मेरे जीवन की
मेरी ये घड़ियाँ
मुझको ही
जी जाने दो;

उन स्वप्निल
आशाओं के
बिखरन की पीड़ा,
तुम क्या जानोगे?
मेरे उस सच के
सच को
तुम क्या मानोगे ?

मान भी जाओ,
पर
मेरा  ही रह जाने दो!
मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो !

समर्पण

तुम्हारा वह लाल गुलाब;
आज भी उसी किताब में रखा है,
पर उसकी हर एक पांखुरी और अधर-पत्र;
सूखकर जर्जर और क्षीर्ण हो गये हैं!

तुम्हारे उस अप्रतिम उपहार को;
क्षीर्ण होने से न बचा सका ;
और तुम्हारे वो अव्यक्त उदगार,
आज भी मेरे लिए उतने ही
रहस्य-पूर्ण बने हैं!

क्योंकि मूक समर्पण की भाषा 
मैं समझ न सका था;
और उस भूल के प्रयाश्चित में
मैं और तुम्हारा लाल गुलाब 
दोनों ही रंगहीन हो गये !