सोमवार, 29 जुलाई 2013

निश्छल प्राण छले गये !


प्रिये !
तुम जब से चले गये;

रजनी निज मन को व्यथित कर;
थिर अन्तस् को स्वर प्लावित कर 
मानो 
निश्छल प्राण छले गये !
प्रिये !
तुम जब से चले गये;

नहीं  सुध है अब जीवन की,
न ही कामना कोई मन की,
किंचित 
तुम तो भले गये !
प्रिये !
तुम जब से चले गये;

12 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति ....!!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (30-07-2013) को में” "शम्मा सारी रात जली" (चर्चा मंच-अंकः1322) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर संक्षिप्त सम्पूर्ण भाव....

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  3. किसी का जाना कभी कभी कितना खलता है
    भावपूर्ण सुन्दर !

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  4. किसी के न होने ... या चले जाने का दंश और फिर जब प्रिय ही न हो तो उसका न होना तो आत्मा निकाल देता है .... भाव मय प्रस्तुति ...

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  5. कम शब्दों में गहन भाव ......
    बेहद मर्मस्पर्शी

    उत्तर देंहटाएं

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