बुधवार, 17 जुलाई 2013

मेरी पीड़ा !

मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो ,
मेरे जीवन की
मेरी ये घड़ियाँ
मुझको ही
जी जाने दो;

उन स्वप्निल
आशाओं के
बिखरन की पीड़ा,
तुम क्या जानोगे?
मेरे उस सच के
सच को
तुम क्या मानोगे ?

मान भी जाओ,
पर
मेरा  ही रह जाने दो!
मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो !

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर है .धन्यवाद
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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  2. कुछ सिखाती समझाती कविता...... बहुत सुंदर भाव

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरे उस सच के
    सच को
    तुम क्या मानोगे ?
    मेरी पीड़ा;
    मुझको ही
    पी जाने दो !

    बहुत उम्दा,सुंदर भावपूर्ण पंक्तिया ,,,

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच ...सबकी अपनी पीडाएं हैं अपने दुःख हैं.....

    बहुत कोमल रचना..
    अनु

    उत्तर देंहटाएं

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