सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मेरी पीड़ा !

मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो ,
मेरे जीवन की
मेरी ये घड़ियाँ
मुझको ही
जी जाने दो;

उन स्वप्निल
आशाओं के
बिखरन की पीड़ा,
तुम क्या जानोगे?
मेरे उस सच के
सच को
तुम क्या मानोगे ?

मान भी जाओ,
पर
मेरा  ही रह जाने दो!
मेरी  पीड़ा;
मुझको ही
पी जाने दो !

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्दर है .धन्यवाद
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ सिखाती समझाती कविता...... बहुत सुंदर भाव

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरे उस सच के
    सच को
    तुम क्या मानोगे ?
    मेरी पीड़ा;
    मुझको ही
    पी जाने दो !

    बहुत उम्दा,सुंदर भावपूर्ण पंक्तिया ,,,

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच ...सबकी अपनी पीडाएं हैं अपने दुःख हैं.....

    बहुत कोमल रचना..
    अनु

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "