सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे,
ज़माना फिर से गुज़र गया।

इक सूखा सा दरख्त कोई,
हरा हो फिर से शज़र गया।

कोई लम्हा टिक कर रहता नहीं,
सन्नाटा सदियों का पसर गया।

तीरगी क्या थी जुम्बिशों की
जिसमें डूब ही समंदर गया ।

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी,
दुःख-सुख के लम्हों से संवरती चली गयी।

जैसे ही हुआ पैदा, रिश्तों ने बांध लिया,
जोड़-तोड़ में जिंदगी बिखरती चली गयी।

रोटी,पैसा और फिर अपनों की तलाश में
राहे गुजर में यहाँ-वहाँ भटकती चली गयी।

जिस दीवार के सर पे थी छत टिकी हुयी,
क्यों वो नेह की दीवार दरकती चली गयी।

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी,
दुःख-सुख के लम्हों से संवरती चली गयी।

हम हुए आजाद......., कि आज रोटी पकेगी।

हम हुए आज़ाद
कि आज रोटी पकेगी,
हुयी महंगी दाल
कि तरकारी रंधेगी........
हम हुए आज़ाद..........

डंडे खाये -लाठी खायी
और कुछ ने तो अपनी
गरदन भी कटवायी,
कि जशन पै आज
मुला दारू बटेगी......
हम हुए आजाद........।

सरकार बड़ी सरकारी है,
जनता की तो लाचारी है।
इस्कूल सबै गिर गए हैं
मुला किताबें खूब बिकेंगी.....
हम हुए आजाद.......।

मरीज़ मरि रहे अस्पतालों में,
डाकडर मस्त हैं भेड़चालों में
मेडिसिन सब बिलैक् भईं,
मुला दवाई खूब बनेंगी........
हम हुए आजाद.......,
कि आज रोटी पकेगी।

भढुवे

ये भढुवे हैं,
रखते हैं स्त्री को
वक्त की चाक पर;

पर भूल जाते हैं,
धुरी में रहने वाली
स्त्री को ।

न चाहकर भी,
स्त्री हो जाती है विवश
कि बचा रहे स्त्रीत्व
वक्त की चाक पर ।

चलता जा राही......

चलता जा राही
साँसों के चलने तक,
रुकना न कभी
मंजिल के मिलने तक।
चलता जा राही..........

जीवन क्या है
बहती एक धारा है,
जीता वही जो
मन से कभी न हारा है।
रात अभी कहाँ,
सूरज के ढलने तक।
चलता जा राही
साँसों के चलने तक।

सुख-दु:ख
तो आने जाने हैं
पल भर को
ही खोने पाने हैं
जलना ही जीवन है
जलता जा
तम के हरने तक,
चलता जा राही
साँसों के चलने तक।