गुरुवार, 15 सितंबर 2016

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे,
ज़माना फिर से गुज़र गया।

इक सूखा सा दरख्त कोई,
हरा हो फिर से शज़र गया।

कोई लम्हा टिक कर रहता नहीं,
सन्नाटा सदियों का पसर गया।

तीरगी क्या थी जुम्बिशों की
जिसमें डूब ही समंदर गया ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-09-2016) को "अब ख़ुशी से खिलखिलाना आ गया है" (चर्चा अंक-2468) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. इक सूखा सा दरख्त कोई,
    हरा हो फिर से शज़र गया।....बहुत सुन्दर ..

    उत्तर देंहटाएं

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