सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेम

तुम्हें मुझसे ही
क्यों प्रेम होना था;


किस्मत का रूठ जाना
अच्छा था,
इन सांसों का टूट जाना
अच्छा था।


भला कोई बिना प्रिय के भी
जी पाता है;
फिर यह प्रेम यूँ ही
क्यों हो जाता है।


मुझे मेरी पीड़ा का तो
मलाल नहीं,
पर तुम्हारी वेदना
मुझे व्यथित कर जाती है।


प्रिये ! मैं तुमसे कहूँ,
भुला दो मुझे;
पर क्या मुमकिन होगा,
तुम्हें भूल जाना मेरे लिए।

टिप्पणियाँ

  1. मुश्किल है दोनों बातों का होना ... दोनों बस में कहाँ होती हीन जब प्रेम आ जाए बीच में तो ...

    जवाब देंहटाएं
  2. Prem ka shuruaat jitna sakoondeh hai utna hi mushkil hai uske ant ka har pal.. Uske baad bhi nhi bhoola ja sakta behad bhaawpurn!!

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?