गुरुवार, 21 जुलाई 2016

भढुवे

ये भढुवे हैं,
रखते हैं स्त्री को
वक्त की चाक पर;

पर भूल जाते हैं,
धुरी में रहने वाली
स्त्री को ।

न चाहकर भी,
स्त्री हो जाती है विवश
कि बचा रहे स्त्रीत्व
वक्त की चाक पर ।

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

चलता जा राही......

चलता जा राही
साँसों के चलने तक,
रुकना न कभी
मंजिल के मिलने तक।
चलता जा राही..........

जीवन क्या है
बहती एक धारा है,
जीता वही जो
मन से कभी न हारा है।
रात अभी कहाँ,
सूरज के ढलने तक।
चलता जा राही
साँसों के चलने तक।

सुख-दु:ख
तो आने जाने हैं
पल भर को
ही खोने पाने हैं
जलना ही जीवन है
जलता जा
तम के हरने तक,
चलता जा राही
साँसों के चलने तक।

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