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थकन

मेरी तल्खियाँ इतनी नागवार तो नहीं कि,
तुझे मेरी सूरत से भी चुभन होने लगी 

मैं तो जिन्दा हूँ तुझे अपना भर मानकर,
तेरे बिन सांसों को भी घुटन होने लगी 

काश बुझ गयी होती ये तमन्ना-ए-दिल,
हर इक आरज़ू को भी जलन होने लगी  ।

गजल कोई उपजे तो भला किस कदर,
जब लफ्ज-लफ्ज को भी थकन होने लगी  ।

टिप्पणियाँ

  1. वाह...
    गजल कोई उपजे तो भला किस कदर,
    जब लफ्ज-लफ्ज को भी थकन होने लगी ।
    बढ़िया ग़ज़ल..
    अनु

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  2. वाह लाजवाब ह्सेर हैं सभी ... और आखरी वाला तो सुभान अल्ला ..

    जवाब देंहटाएं

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