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भूखे और बेबस

इस बार भी
एक विशिष्ट जनों का दल
जा रहा है यूनेस्को की अंतर्राष्ट्रीय
बैठक में हर बार की तरह ,
इस बार भी कूड़े से कबाड़ बीनने वालों की
शिक्षा और स्वस्थ्य होंगे
मुद्दे विशेष।

ऐसे गंभीर मुद्दों पर
चर्चाएं भी तो होती हैं महत्त्वपूर्ण ,
सदियों से चली आ रही
परिपाटियां और अवधारणाएं।  

शिक्षा और स्वास्थ्य जब होजायेगा सुलभ
और शोषित हो जायेगा शिक्षित ,
फिर कहाँ बचेगा कोई
भूखे पेट मजदूरी करने वाले मजदूर,
आखिर विकास का भार भी
तो हैं इन्ही के कर्णधारों पर।

बची रहे गरीबी
तो बचा रहेगा गरीब
मर्ज के लिए मरीज का होना भी तो जरूरी है।  

हाँ चर्चा होगी
हर बार की तरह
इस बार भी इन भूखे और बेबस
बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर।

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?