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बंटाधार

 सत्ताधारी

हो गये हैं सत्तालोलुप ,


सांठ -गाँठ  

और लेन -देन के बिना

चलता ही नहीं कुछ काम।  

अस्पताल , स्कूल

थाना या कोई भी

सरकारी संस्थान,

सब जगह फैला है

भ्रष्टाचार।


नहीं,नहीं

इसका नाम लेकर

न करो इन्हें बदनाम

यही तो है आजकल का

शिष्टाचार।  


व्यभिचार और भ्रष्टाचार

का कोढ़ फैल चुका है

समाज के नश -नश में ,

नहीं दिख रहा कोई

उपचार ,

क्या करे कोई ,

जब सब होगये

स्वार्थवश लाचार।


कुछ नहीं हो सकता

इस राम सहारे रामराज का

या तो जनता सो रही है,

या फिर रोज़ी -रोटी के फेर में

रो रही है।  

आज नहीं तो कल होना है

बंटाधार। 

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?