तुम्हें मुझसे ही क्यों प्रेम होना था; किस्मत का रूठ जाना अच्छा था, इन सांसों का टूट जाना अच्छा था। भला कोई बिना प्रिय के भी जी पाता है; फिर यह प्रेम यूँ ही क्यों हो जाता है। मुझे मेरी पीड़ा का तो मलाल नहीं, पर तुम्हारी वेदना मुझे व्यथित कर जाती है। प्रिये ! मैं तुमसे कहूँ, भुला दो मुझे; पर क्या मुमकिन होगा, तुम्हें भूल जाना मेरे लिए।