गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बस भी करो

तुमने लिखा
पानी,
कहीं जलजला था,
पर
आदमी की आँखों का
पानी मर चुका था।


तुमने लिखी
पीड़ा,
कराहों और चीख़ों से
गूँजते रहे सन्नाटे।


तुम जब लिखने लगे
भूख;
जबरन रोकना पड़ा मुझे
तुम्हारा हाथ
बर्दाश्त के बाहर थी
उस नवजात की चीख़
उसकी माँ को अभी
मिटानी थी
बहशियों की भूख को ।
 

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत कम लोग पहुँच पाएंगे गहराई तक...

    जब दुनियां के लिए भूख लिखी गयी
    तो बहुत सी मजबूरियां और शरहदें तोहफे में मिली

    रंगरूट

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (12.09.2014) को "छोटी छोटी बड़ी बातें" (चर्चा अंक-1734)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. दिखने /लिखने और होने के मध्य संवेदनाओं को झकझोरती है रचना !
    मार्मिक !

    उत्तर देंहटाएं
  4. गहरे अर्थ संजोये सुंदर प्रस्तुति।।

    उत्तर देंहटाएं

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