शनिवार, 6 सितंबर 2014

प्रेम

तुम्हें मुझसे ही
क्यों प्रेम होना था;


किस्मत का रूठ जाना
अच्छा था,
इन सांसों का टूट जाना
अच्छा था।


भला कोई बिना प्रिय के भी
जी पाता है;
फिर यह प्रेम यूँ ही
क्यों हो जाता है।


मुझे मेरी पीड़ा का तो
मलाल नहीं,
पर तुम्हारी वेदना
मुझे व्यथित कर जाती है।


प्रिये ! मैं तुमसे कहूँ,
भुला दो मुझे;
पर क्या मुमकिन होगा,
तुम्हें भूल जाना मेरे लिए।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 06 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. मुश्किल है दोनों बातों का होना ... दोनों बस में कहाँ होती हीन जब प्रेम आ जाए बीच में तो ...

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  3. Prem ka shuruaat jitna sakoondeh hai utna hi mushkil hai uske ant ka har pal.. Uske baad bhi nhi bhoola ja sakta behad bhaawpurn!!

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  4. दिल को छू लिया इस रचना नें ....सुंदर

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