रविवार, 29 सितंबर 2013

पानी वाला घर :





समूह में विलाप करती स्त्रियों का
स्‍वर भले ही एक है
उनका रोना एक नहीं...
रो रही होती है स्‍त्री अपनी-अपनी वजह से
सामूहिक बहाने पर....
कि रोना जो उसने बड़े धैर्य से
बचाए रखा, समेटकर रखा अपने तईं...
कितने ही मौकों का, इस मौके के लिए...। 

बेमौका नहीं रोती स्‍त्री....
मौके तलाशकर रोती है
धु्आं हो कि छौंक की तीखी गंध...या स्‍नानघर का टपकता नल...।

पानियों से बनी है स्‍त्री
बर्फ हो जाए कि भाप
पानी बना रहता है भीतर
स्‍त्री पानी का घर है
और घर स्‍त्री की सीमा....।
स्‍त्री पानी को बेघर नहीं कर सकती
पानी घर बदलता नहीं....।

विलाप....
नदी का किनारों तक आकर लौट जाना है
तटबंधों पर लगे मेले बांध लेते हैं उसे
याद दिलाते हैं कि-
उसका बहना एक उत्‍सव है
उसका होना एक मंगल
नदी को नदी में ही रहना है
पानी को घर में रहना है
और घर
बंधा रहता है स्‍त्री के होने तक...।

घर का आंगन सीमाएं तोड़कर नहीं जाता गली में....
गली नहीं आती कभी पलकों के द्वार हठात खोलकर
आंगन तक...।
घुटन को न कह पाने की घुटन उसका अतिरिक्‍त हिस्‍सा है...
स्‍त्री गली में झांकती है,
गलियां सब आखिरी सिरे पर बन्‍द हैं....।

....गली की उस ओर से उठ रहा है
स्त्रियों का सामूहिक विलाप....


माया मृग

(यह रचना माया मृग जी द्वारा लिखी गयी है मैं उनकी अनुमति का आभार व्यक्त करता हूँ !)

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार - 30/09/2013 को
    भारतीय संस्कृति और कमल - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः26 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  2. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,धन्यबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन रचना ... बहुत दिनों के बाद इतना शशक्त लेखन पढ़ने को मिला ..
    आभार ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १/१० /१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. कल 03/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  6. हर स्त्री की मनोदशा बयां कर दी आपने
    एक एक शब्द सच बोल रहा है
    अद्भभुत प्रस्तुति

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  7. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - जीवन हर पल बदल रहा है पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  8. मायामृग जी की रचनाओं का जबाब नहीं ........

    उत्तर देंहटाएं
  9. पानियों से बनी है स्‍त्री
    बर्फ हो जाए कि भाप
    पानी बना रहता है भीतर
    स्‍त्री पानी का घर है
    और घर स्‍त्री की सीमा....।
    स्‍त्री पानी को बेघर नहीं कर सकती
    पानी घर बदलता नहीं....।
    एक एक रचना जैसे मोती ! पढता जा रहा हूँ , पढता जाऊँगा जब तक समय इजाजत देगा

    उत्तर देंहटाएं

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