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मुझे तुम रहने दो यूँ ही मौन !

मुझे तुम 
रहने दो 
यूँ ही मौन !
कितने प्रश्न 
हैं भीतर मेरे,

सब तोड़ दिए 
वो किये हुए 
अनुबंध मेरे तेरे !

किस आधार पर 
निराधार करेगा 
ये अपराध सारे !

है बेहतर 
मेरा मौन ही 
रह जाना !
किसको किसने 
कबतक किसका 
है माना !!

फिर सोंच यह 
उठता है मन मेरे ,
किस जीवन में 
कितनी हैं 
शामें और 
कितने है सवेरे !!
मुझे तुम 
रहने दो 
यूँ ही मौन !
कितने प्रश्न 
हैं भीतर मेरे,

मुझे तुम 
रहने दो 
यूँ ही मौन !
कितने प्रश्न 
हैं भीतर मेरे,

टिप्पणियाँ

  1. मौन सबसे बेहतरीन संवाद है!

    सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (19-09-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 121" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कभी कभी मौन रहना ही सबसे उचित होता है. सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह ! बहुत ही उत्कृष्ट रचना ! अति सुंदर !

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन में उठती उठापटक को विश्राम कहां मिलता है ... बस मौन रहना ही उचित होता है ऐसे में ... भावपूर्ण ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. jis baat ko kahny sy dard ho. us sy to monn hi bahtar hai............monn apny aap main samvaad hai.........

    उत्तर देंहटाएं
  7. है बेहतर
    मेरा मौन ही
    रह जाना !
    किसको किसने
    कबतक किसका
    है माना !!
    एकदम बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।