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एक और दिन

सुबह की 
शबनमी घास 
या पक्षियों का कलरव,
अधखिली कलियों के 
खिलने की आतुरता 
सब लीन हो जाते हैं 
एक और दिन गुजरने के 
प्रयास में !

और फिर 
सूरज ओढ़ लेता है 
वही चिर पुरानी 
तमिषा की चादर,
शाम होने तक 
कहीं रात उसके 
गुनाहों का 
हिसाब न मांगने लगे !

टिप्पणियाँ

  1. खूबसूरत भावाभिव्यक्ति |
    डॉ अजय
    drakyadav.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  2. खूबसूरत अभिव्यक्ति
    हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  3. और जीवन यूँ ही निरंतर चलता रहता है. सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. जो दिन के उजाले में गुनाह करता है उसे रात कहां ढूंढ पाएगी ...
    लाजवाब गहरी सोच से उपजी रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. sir jo gunaho karta hai,us k liye kya din kya raat.............par bahut umda soch.......badhai dheerendra ji.......

    उत्तर देंहटाएं
  6. मार्मिक रचना । सुन्दर शब्द संयोजन । बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।