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अभिशाप!

धूप,
 जो हुआ करती थी,
सभी की,
आज हो गयी है 
चांदनी चौक का 
एक टुकड़ा जमीन/

जिस पर 
धन कुबेरों का है 
कब्जा ,
व अधिकार,
बनाकर राष्ट्रीय उड्डयन
या ऐतिहासिक स्मारक,
फिर उनमें सशुल्क 
प्रवेश की अनुमति
कर देतें हैं तनिक
उपकार/

छीन  सकते हो यदि
हमारे हिस्से की धूप,
तो छीन  कर दिखाओ,
इन  वातानुकूलित 
घोंसलों से निकल 
दरिद्र भारत के 
मैंदानों में आओ /

जहाँ अभी भी 
हमारा ही अधिकार 
है और रहेगा;
क्योंकि
इसे न छीन पाना 
तुम्हारी विवशता है,
और हमारा
अभिशाप!


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