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अभिशाप!

धूप,
 जो हुआ करती थी,
सभी की,
आज हो गयी है 
चांदनी चौक का 
एक टुकड़ा जमीन/

जिस पर 
धन कुबेरों का है 
कब्जा ,
व अधिकार,
बनाकर राष्ट्रीय उड्डयन
या ऐतिहासिक स्मारक,
फिर उनमें सशुल्क 
प्रवेश की अनुमति
कर देतें हैं तनिक
उपकार/

छीन  सकते हो यदि
हमारे हिस्से की धूप,
तो छीन  कर दिखाओ,
इन  वातानुकूलित 
घोंसलों से निकल 
दरिद्र भारत के 
मैंदानों में आओ /

जहाँ अभी भी 
हमारा ही अधिकार 
है और रहेगा;
क्योंकि
इसे न छीन पाना 
तुम्हारी विवशता है,
और हमारा
अभिशाप!


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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?