मुझे वो पढ़ता रहा
गढ़ता रहा
कभी एलोरा की गुफाओं ,
कभी पिकासो की
मनः स्थितियों में!
लेकिन
कभी वो नहीं
बदल सका
अपनी संकुचित
और शंकालु
प्रवृत्ति
और
डसने को
तत्पर रहता है
हर क्षण !
और आज तक मैं
अनभिज्ञ ही रही
मेरा अस्तित्व
और मैं क्या हूँ
इस पुरुष प्रवृत्ति
के लिए !
?
?
स्त्री मन की स्वाभाविक अकुलाहट।
जवाब देंहटाएंअन्तिम अन्तरे में "अस्तित्व" शब्द ठीक कर लें।
"अनभिज्ञ" भी सुधार लें।
हटाएंविकेश जी आभार आपका !
हटाएंधन्यवाद।
हटाएंबहुत बढ़िया अभिव्यक्ति,,
जवाब देंहटाएंrecent post: वह सुनयना थी,
बहुत अच्छे भाई साहब ..आज कल की दशा पर तंज छोडती हुई रचना
जवाब देंहटाएंrecent poem : मायने बदल गऐ
बहुत सटीक अभिव्यक्ति...
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रचना...
जवाब देंहटाएंपुरुष होते हुए स्त्री मन को समझने के लिए आपको नमन...
विकेश जी की बात पर गौर करें
अनु
स्त्री के अंतर्मन की व्यथा का सुन्दर चित्रण !
जवाब देंहटाएंऔर आज तक मैं
जवाब देंहटाएंअनभिग्य ही रही
मेरा अस्तित्त्व
और मैं क्या हूँ
इस पुरुष प्रवृत्ति
के लिए !
भावपूर्ण रचना..
जवाब देंहटाएंदिनांक 07/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!
कविता और कहानियों में उसकी शस्खियत जितनी रंगीनी से दिखाई जाती है काश सच उतना स्याह न होता. सुन्दर अभिव्यक्ति.
जवाब देंहटाएंवजूद के सृजन और खुद के मूर्तिकरण की बेजोड़ प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर ....!
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना ,बढ़िया अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंNew post :अहंकार
ये सच है कि भारतीय समाज पुरूष प्रधान है परंतु ये भी सच है कि भारतीय संविधान स्त्री प्रधान है । आपकी कवितायें बहुत बढि़या हैं ।
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