सोमवार, 17 दिसंबर 2018

कीमत

तुम आ गए हो तो रौनक आ गई है
गरीबखाने  में
वगरना कोई कब्रिस्तां में जश्न मनाता है क्या।

एक इश्क ही तो है जिसमें लोग लुट जाते हैं,
यूं ही मुफ्त में कोई वजूद अपना मिटाता है क्या।

जो तुम कुछ दे देते हो एक दुआ के खातिर,
वह फकीर कभी अपना एहसान जताता है क्या।

मुनासिब है कि पी जाएं मयखाने को एक प्याले में डालकर,
कब कौन कीमत कोई साकी की लगाता है क्या।

तुम आ गए हो तो रौनक आ गई है
गरीबखाने  में
वगरना कोई कब्रिस्तां में जश्न मनाता है क्या।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (19-12-2018) को "ज्ञान न कोई दान" (चर्चा अंक-3190) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Very Nice.....
    बहुत प्रशंसनीय प्रस्तुति.....
    मेरे ब्लाॅग की नई प्रस्तुति पर आपके विचारों का स्वागत...

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

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