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लहू के रंग


कलम की स्याही 
लाल हो गयी स्याह से;
धमनियों का रंग 
नीला होता जा रहा है!
धरती शोले उगल रही;
और आसमान 
गर्म लोहा बरसा रहा है;

ये सब इंसान के 
निर्जीव ह्रदय की 
संवेदन हीनता के 
परिणाम हैं!

घर के चूल्हे में,
सिकने वाली रोटियां,
अब राजनीतिक मुद्दों पर
सेंकी जाती हैं;
जिनसे राज नेताओं की
भूख और तेज होकर 
निगल रही है 
गरीब जनता के मुह के निवाले भी!

मुट्ठी भर मातृभूमि की मिटटी
जो थी कभी माँ तुल्य
आज माँ भी बिलख रही है
अपने आंचल की 
रक्षा के लिए
जिसे तार-तार 
करता जा रहा है 
उसका ही बेटा!

टिप्पणियाँ

  1. गहन भाव ,सुन्दर अभिव्यक्ति !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही भावपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार ७/५ १३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत दुखद स्थिति है पर बिलकुल सच लिखा है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सर्वोत्त्कृष्ट, अत्युत्तम लेख आभार
    हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र कुछ नया और रोचक पढने और जानने की इच्‍छा है तो इसे एक बार अवश्‍य देखें,
    लेख पसंद आने पर टिप्‍प्‍णी द्वारा अपनी बहुमूल्‍य राय से अवगत करायें, अनुसरण कर सहयोग भी प्रदान करें
    MY BIG GUIDE

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "