सोमवार, 6 मई 2013

लहू के रंग


कलम की स्याही 
लाल हो गयी स्याह से;
धमनियों का रंग 
नीला होता जा रहा है!
धरती शोले उगल रही;
और आसमान 
गर्म लोहा बरसा रहा है;

ये सब इंसान के 
निर्जीव ह्रदय की 
संवेदन हीनता के 
परिणाम हैं!

घर के चूल्हे में,
सिकने वाली रोटियां,
अब राजनीतिक मुद्दों पर
सेंकी जाती हैं;
जिनसे राज नेताओं की
भूख और तेज होकर 
निगल रही है 
गरीब जनता के मुह के निवाले भी!

मुट्ठी भर मातृभूमि की मिटटी
जो थी कभी माँ तुल्य
आज माँ भी बिलख रही है
अपने आंचल की 
रक्षा के लिए
जिसे तार-तार 
करता जा रहा है 
उसका ही बेटा!

10 टिप्‍पणियां:

  1. गहन भाव ,सुन्दर अभिव्यक्ति !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही भावपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार ७/५ १३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत दुखद स्थिति है पर बिलकुल सच लिखा है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सर्वोत्त्कृष्ट, अत्युत्तम लेख आभार
    हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र कुछ नया और रोचक पढने और जानने की इच्‍छा है तो इसे एक बार अवश्‍य देखें,
    लेख पसंद आने पर टिप्‍प्‍णी द्वारा अपनी बहुमूल्‍य राय से अवगत करायें, अनुसरण कर सहयोग भी प्रदान करें
    MY BIG GUIDE

    उत्तर देंहटाएं

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