मंगलवार, 27 अगस्त 2013

धर्म हठ

मैंने भी बादल की 
एक बूँद  के
इन्तजार में;
बिताया है
पूरा एक बरस !


फिर मन मार कर
धरती की छाती में 
धँसा दिया 
नुकीला हल !

क्योंकि 

मुझे तो निभाना ही था,
एक किसान का धर्म ;

भले ही
नष्ट हो जाय 
एक और सभ्यता 
अपने विकास के 
चरमोत्कर्ष 
परिणामों से !

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

१५ अगस्त -२०१३ : एक और कैलेंडर !

अभी कल ही लगा था कि
देश आजाद हो गया है !

भले ही दो टुकड़े 
होने के बाद 
और "ग़दर" या 
'शरणार्थियों' की
बदत्तर हालातों से परे,
देश ने भी महसूसा था 
आज़ादी पन को !

धीरे-धीरे 
बीत गये छियासठ बरस
चमकती आँखों की 
शून्यता में वो सरे 
सपने , 
लोकतंत्र की राजनीति की 
भेंट चढ़ गये !

अब राजनेता 
या 
'कार्पोरेट' ही मनाते हैं 
आज़ादी का उल्लास!

और 
किसान का बच्चा 
अब भी खड़ा है'
 सर झुकाए 
यस सर या 
हाँ, मालिक !
एक सिवा 
उसे नहीं है 
आज़ादी बिसलेरी के बचे
हुए पानी को 
भी पीने की !

४७ से १३ तक 
कुछ बदला है तो 
बस एक 
"कैलेंडर"

बुधवार, 7 अगस्त 2013

आदमियत से आदमी तो न चुरा !

हँसते हैं लोग तो हँसने दो,
खुद से नज़रें तो न चुरा !

कब छुपती है आईने से हकीकत,
हकीकत से नजरें तो न चुरा !

हो रहा है ज़ार-ज़ार कफ़न,
ताबूत से लाश तो न चुरा !

दुश्वार है जीना एक आदमी का,
आदमियत से आदमी तो न चुरा !

मुफलिसी या अमीरी फर्क चश्मे का,
भूख से निवाले तो न चुरा !

सोमवार, 5 अगस्त 2013

श्रमिक !

लफ्ज दर लफ्ज 
जिन्दगी जीता 
कभी धरती के सीने को 
फाड कर उगाता जीवन;

पहाडों को फोडकर;
निकालता नदियाँ ।

जिसकी पसीने की 
हर एक बूंद दर्शन का
ग्रन्थ रचती ।

उसके जीवन का
हर गुजरता क्षण
ऋचाएं रचता ;


हर सभ्यता का निर्माता
तिरष्कृत और बहिष्कृत
ही रहा सदियों से।

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