सोमवार, 5 अगस्त 2013

श्रमिक !

लफ्ज दर लफ्ज 
जिन्दगी जीता 
कभी धरती के सीने को 
फाड कर उगाता जीवन;

पहाडों को फोडकर;
निकालता नदियाँ ।

जिसकी पसीने की 
हर एक बूंद दर्शन का
ग्रन्थ रचती ।

उसके जीवन का
हर गुजरता क्षण
ऋचाएं रचता ;


हर सभ्यता का निर्माता
तिरष्कृत और बहिष्कृत
ही रहा सदियों से।

11 टिप्‍पणियां:

  1. श्रमिक के जीवन पर विचारणीय कविता-पाठ। कृपया(हर सभ्‍यता) या (सभ्‍यताओं) में से एक का चुनाव करें।

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  2. बहुत बढ़िया...
    विचारणीय भाव.....

    अनु

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  3. ऋचाएं रचता जीवन जो प्रणम्य है वही रहता है तिरस्कृत!
    यही तो विडम्बना है!

    सुन्दर रचना!

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  4. हाड तोड़ मेहनत के बाद भी वंचित सम्मान से , अर्थ से !

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  5. बहुत सुन्दर. जिनका वास्तव में पसीना में बहता है वो गुमनामी में ही रहते हैं . बारीकी से गौर करने हर क्षेत्र में कुछ ना कुछ ऐसा दिखेगा.

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  6. श्रामिक के जीवन की गाथा ... बहुत ही प्रभावी, कम शब्दों में पूरा ग्रन्थ लिख दिया .... नमन है अनाम श्रमिक को ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. जिसकी पसीने की
    हर एक बूंद दर्शन का
    ग्रन्थ रचती ।

    उसके जीवन का
    हर गुजरता क्षण
    ऋचाएं रचता ;

    हर सभ्यता का निर्माता
    तिरष्कृत और बहिष्कृत
    ही रहा सदियों से।
    बहुत सार्थक शब्द संयोजन

    उत्तर देंहटाएं

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